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कुल्लू का मोहक लोक-नृत्य: नाटी

नाटी का जो वर्तमान प्रचलित रूप है, इसे ‘सराजी नाटी’ कहते हैं। नाटी का सम्बन्ध भीतरी सराज से है। इस का उद्भव भले ही कहीं हुआ हो परन्तु यह पल्लवित, पुष्पित और विकसित भीतरी सराज में ही हुई है। नाटी को यदि गीत अर्थात् शब्द यदि कुल्लू ने दिया है तो स्वर, ताल और गति भीतरी सराज से मिली है। आज भी यह क्षेत्र नाटी पर अपना प्रभाव और अधिकार बनाये हुए है। नाटी की मौलिकता और कला का उत्कर्ष यहीं सुरक्षित है।

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