पहाड़ी भाषा और साहित्य का इतिहास तथा उपलब्धियां | सोमसी आलेख (1990)

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हिमाचल कला, संस्कृति और भाषा अकादमी की त्रैमासिक पत्रिका सोमसी के संयुक्तांक 63-64 (जुलाई व अक्तूबर, वर्ष 1990) में छपा डॉ० पीयूष गुलेरी तथा डॉ० बंशीराम शर्मा द्वारा लिखित एक आलेख।


समाज में मानव का आधा भाग भाषा ही माना जाता है। जिस प्रकार मनुष्य की कोई परिभाषा कठिन है, उसी प्रकार भाषा की भी सही परिभाषा सरल नहीं है। यह सभी जानते हैं कि जहां कुछ व्यक्ति इकट्ठे रहते हैं वहां भाषा बन जाती है। समय तथा विद्वानों के अनुभव के अनुसार भाषा की परिभाषाएं बदलती रही हैं। कई बार बोली जाने वाली ध्वनियों को भाषा कहा गया तो अनेक बार संस्कृति की विशेषताओं के बीच भाषा बंधी। कई बार उसे हमने विचार प्रकट करने का साधन माना। लेकिन एक बात स्पष्ट है कि जब कोई ‘बोली’ साहित्य-रचना का माध्यम बनती है और अपनी अलग पहचान बना लेती है तो उसे उपभाषा की पदवी मिलती है फिर वही उपभाषा अपनी अन्य सहभागी बोलियों के साथ मिलकर जब अलग परिचय व स्थान प्राप्त करती है तो ‘भाषा’ बन जाती है।

पहाड़ी भाषा का अर्थ है―पहाड़ों में बोली जाने वाली भाषा। हिमाचल प्रदेश तथा उसके समीपस्थ क्षेत्रों में बोली जाने वाली समान भाषा के आधार पर इस भाषा को पहाड़ी (हिमाचली) भाषा कहा जाता है। हिमाचल प्रदेश के मुख्य क्षेत्र कुल्लू, मण्डी, बिलासपुर, हमीरपुर, शिमला, सोलन, सिरमौर, चम्बा, कांगड़ा, ऊना, लाहुल-स्पिति और किन्नौर हैं। इन क्षेत्रों में लाहुल-स्पिति और किन्नौर में तिब्बती-वर्मी भाषा की हिमालयी बोलियों का प्रचलन है तथा अन्य क्षेत्रों में आर्य भाषा परिवार की पहाड़ी उपभाषाएं बोली जाती हैं। (पहाड़ी) हिमाचली की मुख्य उपभाषाओं में सिरमौरी, क्योंथली, बघाटी, हिंडूरी, कहलूरी, सिराजी, सतलुज क्षेत्रीय, कुल्लवी, मण्डियाली, कांगड़ी और चम्बयाली हैं। जिस प्रकार वर्तमान हिन्दी में राजस्थानी, ब्रज, अवधी, भोजपुरी, मगधी, मैथिली आदि उपभाषाएं हैं और उनमें लिखा गया साहित्य हिन्दी का अंग है, वैसे ही पहाड़ी भाषा की इन उपभाषाओं में रचित साहित्य पहाड़ी भाषा का साहित्य है। भले ही पहाड़ी भाषा की भाषा वैज्ञानिक समीक्षा करना इस लेख में हमारा उद्देश्य नहीं है परन्तु फिर भी यह स्पष्ट किया जाना आवश्यक है कि समय-समय पर भाषा की पहचान, रूप तथा स्वरूप बदलते रहते हैं। इस दृष्टि से मैथिली तथा नेपाली का उदाहरण दिया जाना उपयुक्त होगा। अब लगभग सवा दो सौ वर्ष पहले नेपाली भाषा का कोई स्पष्ट स्वरूप नहीं था। उससे पूर्व काठमाण्डू की घाटियों में ‘नेवारी’ भाषा का प्रचलन था। पूर्वी पहाड़ियों की ओर खासकुण और पश्चिमी पहाड़ियों की ओर तिब्बती भाषा के मिले-जुले रूप प्रचलित थे। अठारहवीं शताब्दी में पश्चिमी पहाड़ियों में गोरखों के राज्य की स्थापना के पश्चात उनकी भाषा ने “नेपाली” की पहचान बनाई और उसका अस्तित्व स्थिर हुआ। अब पश्चिमी क्षेत्र में निवास करने वाले गोरखों की भाषा नेपाल की राजभाषा है। स्पष्ट है कि इतिहास की घटनाओं तथा परिस्थितियों के साथ भाषा की पहचान व स्वरूप बदलते रहे हैं।

मैथिली भी उत्तर बिहार की उपभाषा है। पर्याप्त समय पूर्व भाषा शास्त्रियों में यह ऊहापोह रही कि उसे बंगाली भाषा की उपभाषा माना जाए अथवा इसका सम्बन्ध पूर्वी हिन्दी के साथ जोड़ा जाए। उस समय इसकी अलग लिपि भी थी, ठीक वैसे ही जैसे पहाड़ी (हिमाचली) की टांकरी लिपि है। प्रसिद्ध विद्वान् डॉ० इब्राहिम ग्रियर्सन ने इसे भोजपुरी के साथ रखकर पूर्वी हिन्दी की उपभाषा बताया। वहां के लेखक इसका विरोध करते रहे। उन्हीं के यत्नों का परिणाम है कि मैथिली का साहित्य समृद्ध हुआ और जब १९१७ ई० में कलकत्ता विश्वविद्यालय में वर्तमान भारतीय भाषाओं का अलग विभाग बना तो मैथिली भाषा को हिन्दी व बंगला के बराबर स्थान मिला। मैथिली भाषा ने अब देवनागरी लिपि को अपना लिया है, वैसे ही जैसे हिमाचल प्रदेश की पहाड़ी भाषा देवनागरी लिपि में लिखी जा रही है। ठीक ऐसे ही बंगला भाषा के उन्नत होने की कहानी है। कहने का तात्पर्य यह है कि डॉ० ग्रियर्सन द्वारा किए गए भाषा के विभाजन को अंतिम अध्ययन नहीं माना जा सकता। इसलिए हम ठाकुर मौलूराम के विचार जो उन्होंने “पहाड़ी भाषा ― उद्भव और स्वरूप” में इस प्रकार स्पष्ट किए हैं, से सहमत हैं कि,

“….यहां उन्होंने (चैटर्जी) ‘पूर्वी पहाड़ी’ को हिन्दी प्रदेश से निकाल दिया है और मध्य पहाड़ी और पश्चिमी पहाड़ी को नितांत अलग भाषाएं बताया है। बोलियां नहीं। स्पष्ट है कि उन्होंने पश्चिमी पहाड़ी को पूर्वी पहाड़ी और मध्य पहाड़ी से स्वतन्त्र भाषा माना है, भले ही उन्होंने इसका अलग नामकरण नहीं किया और नामकरण क्षेत्र विशेष के भाषा भाषियों ने स्वयं कर दिया है, जब कि पूर्वी पहाड़ी वाले अपनी भाषा को नेपाली, मध्य पहाड़ी वाले गढ़वाली और पश्चिमी पहाड़ी वाले पहाड़ी कहें। इन सभी मान्यताओं और धारणाओं के अन्तर्गत केवल वर्तमान हिमाचल प्रदेश तथा उसके साथ लगने वाले क्षेत्र की भाषा को ही ‘पहाड़ी’ कहना युक्तिसंगत तथा उचित होगा।”१

पहाड़ी भाषा: कुल्लुई के विशेष संदर्भ में ― मौलूराम ठाकुर, पृ० ५०, ५१

हिन्दी, बंगला, नेपाली तथा मैथिली भाषाओं की यात्रा की तरह ही पहाड़ी भाषा इस क्षेत्र की संस्कृति को भली प्रकार प्रकट कर सकती है। यह भाषा शताब्दियों से लेकर लोक की विचार चर्चा, मेल-मिलाप तथा आपसी व्यवहार, राजकाज, हुकुमनामे, वैद्यों के नुसखों तथा बही खातों आदि में प्रयुक्त होती रही है। इसका इतिहास इसके लोकगीतों, गूगा की गाथा, लामण, झेड़ों, वारों, ऐंचलियों, खेलों और देव-आह्वान के गीतों, मन्त्रों आदि में मौखिक रूप से तथा राजा-रानियों की गीतियों, शिलालेखों व ताम्रपत्रों में लिखित रूप से सुरक्षित है। उक्त विवेचन के उपरान्त यह कहा जा सकता है कि पहाड़ी भाषा की पहचान, इतिहास तथा परख, परिचय उपलब्ध है।

पहाड़ी का उद्भव

पहाड़ी (हिमाचली) भाषा की उत्पत्ति शौरसेनी अपभ्रंश से हुई। अपभ्रंश के इसी रूप से ब्रज, हरियाणवी, पंजाबी, राजस्थानी तथा गुजराती भाषाओं की उत्पत्ति हुई। हिमाचल प्रदेश की पहाड़ी भाषा की खास बात है कि पहाड़ी भाषा के साथ कोल व किरात भाषाओं का जुड़ा रहना, यात्रा की सुविधा न होना (विशेष रूप से हिमाचल के संदर्भ में) परन्तु इससे भाषा के विकास-प्रसार में तनिक भी कठिनाई नहीं आई। इसीलिए पहाड़ी (हिमाचली) भाषा में लेखन ११वीं तथा १२वीं शताब्दी में आरम्भ हो गया था। हेमचन्द्र जी के व्याकरण में इसके कई उदाहरण मिलते हैं। एक उदाहरण देना उचित रहेगा।

भला हुआ जु मारिया बहिणी म्हारा कंतु।
लज्जेजं जु वयंसियहु, जई भग्गा घर एंतु।। 

भला हुआ, मारिया, बहिणि, म्हारा, कन्त आदि ऐसे शब्द हैं जो ठीक इसी रूप में अभी भी पहाड़ी भाषा में प्रयुक्त होते हैं।

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सभ्यता संस्कृति, भाषा और इतिहास के परिचय के लिए पुराने पट्टे, शिलालेख प्रामाणिक माने जाते हैं। हिमाचल प्रदेश में बोली जाने वाली भाषा का लिखितरूप चम्बा, कांगड़ा, कुल्लू, बिलासपुर, रामपुर बुशहर, किन्नौर तथा सिरमोर में है। पहाड़ी भाषा की टांकरी लिपि में लिखे हुए कुछ शिलालेख, ताम्रपत्र तथा बही-खाते आदि मिलते हैं। इस प्रदेश की टांकरी लिपि में लिखे हुए पहाड़ी भाषा के नमूने नादातर राजकाज, हुकमनामे, करारनामे या जमीन सम्बन्धी लेन-देन के बारे में हैं। इस सम्बन्ध में डॉ० रीता शर्मा ने चम्बा के राजा बैरसी वर्मन के ताम्र पत्र पर लिखे पहाड़ी भाषा अभिलेख को सबसे पुराना माना है। यह लेख १३३० ई० का है और इसमें मणीक ब्राह्मण को गिरोली जमीन दान में दिए जाने से सम्बन्धित हवाला दिया गया है। इस अभिलेख में इस प्रकार लिखा गया है―

“गिराली बड़े बण पिचो ढलदे कुहले खुंबे तएं…. तथ किलारे दे ढिहये तए बहि ये श्यचे शवड़ पिचो दखण दिशि हल्याणा रि नलि मिलदे पणि तये…. भगोणे दे ह्यठ मणीक जोग दित्ती…. होर से उच करी तय दण जगत होरे घर त्रीणी श्री दीवण…. लगत श्री देवणे भोए शरण दित्ता”

यह अभिलेख चम्बयाली में लिखा है और इससे यह स्पष्ट होता है कि सन् १३३० ई० के आसपास चम्बा और इसके साथ लगते क्षेत्रों में पहाड़ी भाषा बोलचाल, राजकाज तथा तीज-त्यौहारों की भाषा थी।

इसी तरह सन् १३८६ ई० के भोट बर्मन के ताम्रपत्र में पहाड़ी भाषा का रूप इस प्रकार मिलता है―

“पछम दीश गकोली छो ताए दीश शिध ताए।…. श्री देवण गंए उप्र विर्म जो दीती एह जोग-शबका छड्य…. उकरीरीतठठर रूपुणु”

सन् १४४२ ई० में लिखे गए ताम्र पत्र में पहाड़ी भाषा का यह रूप सामने आता है―

“बड़े राएमोट बर्मने दे अस्तू बडू लेघे गंगा प्रवह करि आया…. श्राद्ध बड़े राए जे होए…. शाशण हथ पाणि दित्ते…. विष्णु प्रीती भीतर प्रीती। एह श्री राए दे पुत्र पोत्रे चालण। बहुए दे पुत्र…. खाणपीण।”

पहाड़ी भाषा की यात्रा में सन् १५८२ ई० का एक और ताम्र पत्र उपलब्ध है, जिसमें इस प्रकार उद्धृत किया गया है―

“श्री नारायणे री प्रतिष्ठा – जोग मंगलीअ ग्राम श्री नारायण तंई से…. मुग पेड़ा। त्रामे के ४, घृत १/४ त्रामे टके, मखीर १/४ त्रामे टके ५….कर। श्री नारेण जो देअ करण….।”

हिडिंम्बा का मन्दिर मनाली में है, जहां इस प्रकार लिखा हुआ पाया गया―

“ओं श्री हिडेम सदे श्री महाराज श्री बहादुरसिंघ जी राजा सम के जोगत का देवी रा देहरा।”

चम्बा के ब्रजेश्वरी मन्दिर में उपलब्ध शिलालेख के कुछ अक्षर इस प्रकार हैं―

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“सं० ९२ असड़ प्र १७/देहरे कम लय अहे। मुइसल मरचु लुहार मदन। त्रखान जीटु री बंड।”

डॉ० रीता शर्मा ने अपने शोध पत्र “हिमाचली पहाड़ी भाषा और इसके विकास में टांकरी लिपि का योगदान” में इस प्रकार लिखा है कि पांगी बजारत में मिंधल परगना के लिए गए एक ताम्र पत्र में यह पंक्तियां अंकित हैं, जिनसे पांगी में बोली जाने वाली पहाड़ी भाषा का पता चलता है, वह इस प्रकार है―

“इक मिंधला सीमाये प्रने समेते श्री चामुण्डा की श्री महाराजे पृथ्वीसिंधे कुल रे…. आई पूजी संकल्प करी दित्ता…. मिंधले से देणा…. दयोल बाजो री बजीरी मंझ शासण दित्ता…. शुवर्ण कार अर्जण जीवन शुन।”

कांगड़ी में सन् १७५० ई० का लिखा हुआ एक फोटो पर कुछ पांडुलिपियों का वर्णन मिलता है―

“श्री राजे बलवंतसिंघ जे ऐह तसवीर दी दा लिखी दी है। श्री महाराज बलवंतसिंघ जी तिन्हे देणे एह तसवीर लीखी तां समत त्र वरह दा था बसाख था। लीखत नैन सुख।”

सन् १७७२ ई० का पहाड़ी भाषा में लिखा हुआ हुकमनामा मिलता है। इस हुकमनामें के अनुसार मण्डी और चम्बा रियासतों के मध्य हुए इकरार का हवाला इस प्रकार उद्धृत किया गया है―

“श्री संवत् ४८ रे हाड़ा प्रविष्टे २१ श्री महाराजे श्री राजसिंह की २००००० अखरे की दोए लख रूपए श्री मींए धूर्जाटिए अछने देणे मन्ने एक बाबत ऐ जो श्री शमशेर सैने दी राजसी कम करी देणा। जिह्यां चम्बा तिह्यां मण्डी दोहनी घरे दी शरम-धरम…. पहरा श्री राजे श्री राजसिंहे देणा धरम।”

डॉ० विश्वचन्द्र ओहरी, पहाड़ी रचनासार, पुराणे इतिहासिक पत्र।

दूधी बिच फितफाड़त नी करणी जे कोई तफाड़त करे सै श्री ठाकुरे दा झूठा त्रिहनी टोले लिखे माफक धर्म रखणा। बीड़ा दे हंगामें दा कौले जाबाब स्वाल करणे तां त्रिहनी टोले अकट्ठै जबाब स्वाल मलाणे….। एह धर्म श्री राजे राजसिंहे की लिखी दित्ता।”

डॉ० विश्वचन्द्र ओहरी, पहाड़ी रचनासार, पुराणे इतिहासिक पत्र।

सन १७८८ ई० में राजा राजसिंह और राजा संसारचन्द के मध्य हुए एक इकरारनामे का पहाड़ी रूप इस प्रकार मिलता है―

“श्री राम जी लिखत श्री राजा राजसिंघ श्री राजा संसार चन्दे की धर्म लीखी दित्ता धरम एहे जे सूत्र सहना कीठा रखणा इक हुकम दुहीं रखणा अपणे-अपणे बन्ने पार हुही कायल रैहणा…. इस धरमे बीच जे कोई फरक करे तां श्री लछमी नाथ मनीमहेश श्री देवी चौंड…. दरम्याल….।”

मण्डी में टांकरी में लिखा हुआ इस प्रकार मिलता है―

“श्री सम्वत् १९५८ रे …. माघ प्रविष्टे २१ रे राजे श्री महराज श्री भवानी सेन दा उमर ३३ साल २० दिन के सुरगवास हुए।”

बिलासपुर की कहलूरी उपभाषा में एक पत्र के अनुसार पहाड़ी का नमूना इस प्रकार है―

“ओं। माहराजे श्री हीरचन्दे बचने प्रती हजुर उपर हुए ओबरी बलासपुर बजारे बीच गणसुर बरमणो अनु दुहऐ ते उतर दे कनारे हजारीए पुल दे सुलतानी च ए चढ़े को अड़ी बरसी करी के बगस्ये हुए…. एह ही ओबरा इस गणसुए ते नहीं बणदा था अजूर दीए करी उजड़ था ता दीता हुण खेचल़ हुजत नी करणी।”

इसी क्रम में कुछ पत्र-व्यवहार रामपुर बुशैहर से भी हैं, जिसका उदाहरण देना उचित रहेगा―

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“हुकमनामा बनाम श्री सुरजना राए न के कामदारन को बाजे होउ प्रंत जो की सं० १९८७ स्रो प्र० २४ गते नीरमंड गे श्री अंबीका जी के जग की छबछ लछनी है। सं० १९८७ स्रो प्र० १५ लीखा फखत।”

हड़सर गांव में सन १७८२ ई० का एक शिलालेख मिलता है। शिलालेख इस प्रकार है―

“ओं श्री सम्वत् ५८ जेठ प्रविष्ट १४ भगसयाणी रे पुत्र भंगुए…. एह महादेव अड़सरे थाप्या।”

उपरोक्त तथ्यों के आधार पर यह स्पष्ट हो जाता है कि चम्बा, कांगड़ा, मण्डी, बिलासपुर, कुल्लू, शिमला और रामपुर बुशैहर तक पहाड़ी भाषा राजकीय भाषा तथा पत्र-व्यवहार के लिए प्रयुक्त होती थी। इससे यह स्पष्ट होता है कि पहाड़ी भाषा सन् १३३० ई० से वजूद में आई। इसमें कोई शक नहीं है कि इससे भी पूर्व पहाड़ी भाषा के प्रयोग होने के प्रमाण मिलें। लेकिन यह एक शोध का विषय है।

अब कुछ साहित्यकारों की रचनाओं का उल्लेख किया जा रहा है, जिन्होंने पहाड़ी भाषा के लिए देवनारी लिपि को अपनाया। गुलेरी रियासत के अंतिम राजा बलदेवसिंह के निजी संग्रह से कुछ गीतियां मिलती हैं। राजा बलदेवसिंह स्वयं ब्रज भाषा के कवि थे और उन्हें उस वक्त के लोक कवियों की कविताओं को इकट्ठा करने का शौक था। राजा बलदेवसिंह की एक पांडुलिपि में पहाड़ी भाषा में लिखी गीतिका के कुछ अंश इस प्रकार हैं―

“मान करैंदा राज शिनूं खिलैंदा मल करैंदा राणिये…. कल्याण देई दा जाया जो चन्द दिह्या तिजो वर जो मिलेया तेज बड़ा तलवारी।….. भले भले तरकस भालयां, तलवारी राणे मंझ सुणाया तेरी पाखर भारी। पाखर भारी सिफत तुम्हारी।”

राजा विक्रमसिंह गुलेर रियासत के राजा और राजा बलदेवसिंह के पूर्वज़ थे। राजा विक्रमसिंह का शासन काल सन् १६६२-१६७५ तक माना जाता है। इसी पांडुलिपि में एक और गीतिका मिलती है जिसमें महाराजा जगदीशचन्द्र की रानी तथा राजा रूपचन्द की माता के अच्छे कार्यों का वर्णन है। देखिए उसके कुछ अंश―

मेरे मनैं हरि का नाम पिओरा, पूर्व जाइये न्हौईये श्री गंगा किनारे राम धन धन राणिये दुर्गा देइये तैं गोविन्द सौं चित्त लायआ।
छाओं घनेरी पैंछी रैह्न सुखालड़े धन धन राणिये दुर्गा देहये तैं गोंविंद सौं चित्त लायआ।

पहाड़ी भाषा के बहुत से साहित्यकारों की रचनाएं हमारे सामने आती हैं। अगर इस सम्बन्ध में शोध किया जाए तो इसमें संदेह नहीं कि पहाड़ी भाषा में लिखा साहित्य उपलब्ध न हो। इसी कड़ी में कवि कांशीराम, रूद्रदत्त तथा गणेशसिंह बेदी के नाम उल्लेखनीय हैं। कांशीराम की ब्रज भाषा में “रामगीता” नाम की पुस्तक मिलती है, इसका काल १७४३-१८३५ के मध्य का है। इसमें कुल २०० फुटकर छंद है। इन छन्दों में से छन्द संख्या ११ पहाड़ी भाषा में इस प्रकार उद्ध्रत है―

मोतियां दी लड़ी जे विधाते आप घड़ी
सिर देई तेरें घड़ी घड़ी लाई कुणी घंलणीं
देव है हिरानी बड़ें एहे मेरे मन
जिसा माऊ जिसा दिषी लग झल
झेलिए कुझेलिए दे लक जान निझक किहां चलदी।

पहाड़ी साहित्य और भाषा के इतिहास में गुलेर रियासत की छत्रछाया में रहने वाले कवि रूद्रदत्त का नाम भी उल्लेखनीय है। रुद्रदत्त गुलेर रियासत के राजा शमशेरसिंह के दरबारी कवि थे। रूद्रदत्त के पहाड़ी भाषा में मात्र दो छन्द मिलते हैं। इन छंदो में वियोग, प्रेमी से बिछड़ने की पीड़ा तथा प्रेमी के नाराज हो जाने पर प्रेमिका के पछताने का चित्रण मिलता है―

अज्ज सौंपणा घर गुआंढणी की अत अप्पूं की छैल सिंगार बणाणा।
उन्हें होए मते दिन आया दियां, न्वोड़े मनैं दा जाई कैं रोस चुकाणा।।
नहीं जाणदी असौं कुत गल्ला रूठे, गल लाई के सज्जण अप्पूं मनाणा।
तुस्स दोऐं सहेलियां साथ चल्लौ, असे अपणे प्यारे की दिक्खण जाणा।।

(छन्द संख्या २२)

दूसरे छन्द में प्रेमी के मनाएं जाने पर भी प्रेमिका का रुठे रहना और फिर प्रेमी के चले जाने पर पछताना सहेलियों द्वारा उसे खरी-खरी सुनाना, पहाड़ी भाषा की मधुरता का प्रयोग इस छन्द में बखूबी किया गया है। देखें छन्द―

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अड़िए छोड़ सुपारसें झूठिए की, नौंई रुस्सणे दी तुक्की बाण लग्गी।
पेईपैरें प्यारा करी खड़ा रेहा, उस दिक्खी कैं अहौं बी मनाणा लग्गी।
उत्त बेलैं मती करी अकड़ी तूं उठी गेया तां भाखां सुणाणा लग्गी।
नहीं मन्नी मनाई द़ी अप्पूं ही तू, हुण पिच्छोआं कैंह पछताणा लग्गी।

इन सवैयों में आज की पहाड़ी भाषा का बहुत सुन्दरता से प्रयोग हुआ है। गणेशसिंह बेदी बिलासपुर रियासत के दरबारी कवि थे। इन्होंने लगभग २४ ग्रंथ ब्रज भाषा में लिखे। इनमें “नानक सूर्योदय जन्म साखी” और “कृष्णचन्द्र चन्द्रिका” महाकाव्य हैं। इनके ग्रन्थों में पहाड़ी भाषा का बहुत अधिक प्रयोग हुआ है।

डॉ० मनोहरलाल के अनुसार चरपटनाथ पहाड़ी भाषा के प्रथम कवि हैं। चरपट नाथ, नाथों में से एक संत कवि थे। राजा साहिल बर्मन की पुत्री इनकी शिष्या थी। उसी शताब्दी में उनके द्वारा कही पंक्तिया इस प्रकार हैं―

ताबां तूंबा ये दोई सूचा
राजा ई तैं जोगी ऊचा।।
तांबा डूबे तूंबा तरे
जीवे जोगी राजा मरे।।

संत साहित्य में लोक भाषा का खुलकर प्रयोग हुआ है। लेकिन इस सम्बन्ध में खोज की आवश्यकता है।

इस शताब्दी के पहले भाग में कई साहित्यकार अपनी भाषा में लिखना आसान समझने लगे। इनमें पहाड़ी गांधी बाबा कांशीराम का नाम सबसे ऊपर लिया जा सकता है। बाबा कांशीराम पहाड़ी भाषा के लिए समर्पित थे और उन द्वारा प्रज्वल्लित जोत अब मशाल का रूप धारण कर गई है। इन्होंने अपने गीतों और कविताओं में भाषा के लिए प्यार इस कदर उंडेला है कि आज हमें वह पथ-प्रदर्शक का काम कर रहा है। बाबा जी की लम्बी-लम्बी कविताओं में हमें खण्ड काव्य की झलक भी दिखाई देती है। एक कविता के अंश पठनीय है―

अंगरेजां जितणा भी अंधेर मचाया
असा उतणा ई जाल बछाया
फरंगियां जड़ी चाल चल्ली
असां उस ते रंग जमाया
रंगे ते तिरंग बणाया
ओह् असां कदी लहराणा ए
कांशी दा फरमाणा ऐ।

पहाड़ी गांधी बाबा कांशीराम जी का समय १८८१-१९४३ है। एक और कवि जो पहाड़ी गांधी के समयक है, उनका नाम हरनाम दास है। इनका जन्म सुजानपुर टीहरा में हुआ। यह भी बाबा जी की तरह ही स्वतन्त्रता सेनानी और समाज सुधारक थे। इनका रचना काल लगभग १९२०-१९४० पड़ता है। इनकी एक रचना का नमूना प्रस्तुत है―

मांए मैं तां मुन्नुए दा पाजर पाणा
देरे लाडिया पर जादू खलाणा
अडोसियां पडोसियां छाड़ छड़ाणी
जोगिए दातरा बजाणा
कपड़े मांडे जोगिए नी छड़ें, चेलेया खाणे जो दाणा,
हरनाम दास इक जाने बाझी, मुन्नुए दा रोग नी जाणा।

पहाड़ी भाषा के इन कवियों की सूची में दतारपुर के पंडित हरलाल डोगरा भी हैं। उन्होंने भी अनेक पहाड़ी कविताएं लिखीं। उनकी एक कविता की पक्तियां हैं―

पढ़ि कैकर तूं तरक्की, नीं तां बैठा पींगा चक्की,
मैं कहि-कहि अक्की, हसा उमरा जे तू पढि जांए
होई बड्डा बड़ा मुख पाएं, अप्पू पढ़े लोकां जो पढ़ाएं

सन् १९३७ ई० के आस पास लहौर से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र “हिन्दू धर्म मीमांसा” में सुजानपुर टीहरा के रुद्रदत्त दीक्षित की पहाड़ी कविताएं छपीं। उनकी एक कविता “छल जुगे रा बरतारा” से कुछ पक्तियां यहां पर देनी उचित होंगी―

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कलजुगे दा बरतारा, धर्म किहंयां गुआयां
कोट छोटे कुर्ते तम्मे, चोटी कट्ठी हम्बे लम्मे
मुच्छा दा किया सफाया, धर्म इहयां गुआयां
चुगी भली अपणी छड्डी, दुए दी ऐ प्यारी लग्गी 

इसी पीढ़ी के एक और कवि हमीरपुर के मधो गांव के मेजर बृजलाल हैं। इनका जन्म सन् १९०३ में हुआ था। बृजलाल जी की एक कविता के अंश देखें―

इव अचम्बा दिखेया, आश्चर्य वाली बात,
सूरज, चंद तारे चमके गेई घराते रात
अकवां आले खान मुलेक्खे अन्ने दससण बार
अकवा आले जुटटे जादे, अन्ने रहण मुस्कात

मेजर बृजलाल की पीढ़ी के एक और चर्चित कवि हैं (स्व०) सोमनाथ सिंह “सोम”। इनका “सोम तरंग” कविता संग्रह सन १९५९ ई० में हरिपुर (कांगड़ा) से प्रकाशित हुआ। इस कविता संग्रह में कुछ पहाड़ी कविताएं तथा गीत मिलते हैं। एक गीत का मुखड़ा इस प्रकार से है―

देश आजाद हो गेया लोको, सुकवे दिया निदंरा सेई जाणा।

पहाड़ी साहित्य रचना की इस धारा को घाटी बिनवा के (स्व०) रामचन्द्र शुक्ल, दिल्ली की (स्व०) सावित्री देवी, जसूर (कांगड़ा) के (स्व०) पं० तुलाराम ने अपना-अपना योगदान देकर प्रवाहित रखा। इसी धारा में प्रसिद्ध लोक गायक नलेटी (कांगड़ा) के प्रतापचन्द शर्मा का नाम पहाड़ी संस्कृति में सूर्य के समान प्रकाशमान है। प्रतापचन्द शर्मा की कविताएं अथवा गीत पुस्तकाकार में नहीं आ पाए लेकिन आकाशवाणी केन्द्र, शिमला व दूरदर्शन, जालन्धर से प्रसारित होते रहते हैं। उनका प्रदेश के लोगों में विशेष स्थान है। उनके द्वारा रचित गीत की पंक्तियां बेहद लोकप्रिय हैं।

ठंडी ठंडी हवा झूलदी झुलदे चीलां दे डालू कि जीणा कांगड़े दा।

किसी भी भाषा और साहित्य का इतिहास लिखने के लिए अन्तः साक्ष्य और बाह्य साक्ष्य का आधार होना आवश्यक है। पहाड़ी भाषा व साहित्य का इतिहास लिखने के लिए उपरोक्त तथ्यों के इलावा बहुत सा ऐसा लोक साहित्य है जो सदियों से मौखिक में चला आ रहा है और इस सांस्कृतिक धरोहर को किसी न किसी रूप में अपनी संस्कृति में समेटे हुए हैं, इनमें ग्राम देवता की भारथें, खास उत्सवों पर आयोजित किए जाने वाले आनुष्ठानिक गीत, गूगा गान, ऐंचलियां, पंडवायण, रमैणी, ढोलरू, काव, झेड़े, झंझोटिया, हारां या बारां, लोक नाट्य, बरलाज के गीत, मसादा, रमैण, चैत महीने के गीत, संस्कार गीत, भ्यागड़े और संझड़े, धर्मालिया, भाखियां, पातर और खेला आदि शामिल हैं। इन सब पर कुछ शोध कार्य हुआ है परन्तु अभी बहुत कार्य करने की आवश्यकता है।

बाह्य साक्ष्य के आधार पर हम पहाड़ी भाषा व साहित्य का ऊपर विवेचन कर चुके हैं। पहाड़ी भाषा का रचना काल कई शताब्दियों पूर्व का मिलता है। लेकिन इस तथ्य से इन्कार नहीं किया जा सकता कि उपरोक्त सन् १३३० से भी पूर्व पहाड़ी भाषा रचना काल हो। पहाड़ी भाषा व साहित्य के विकास प्रसार के लिए जितना योगदान आकाशवाणी शिमला का है शायद इतना किसी और मीडिया से न मिला। सन् १९५४ में आकाशवाणी शिमला ने कार्य आरम्भ किया था। इससे पूर्व जिला कांगड़ा के साहित्यकारों की रचनाएं आकाशवाणी जालन्धर से “पर्वत की गूंज” कार्यक्रम के अन्तर्गत प्रसारित होती थी। उस समय के कवियों में डॉ० पीयूष गुलेरी, गौतम व्यथित, और सागर पालमपुरी आदि के नाम प्रमुख हैं।

जब १९६४-६५ में पंजाबी सूबे की मांग जोरों पर थी तो पंजाब प्रदेश में आने वाले पहाड़ी भाषी क्षेत्र हिमाचल प्रदेश के साथ मिलाए गए। इससे पूर्व पहाड़ी इलाकों के विधायकों ने पंजाब पुनर्गठन आयोग से पहाड़ी भाषा के आधार पर जोरदार मांग की। उधर हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री (स्व०) डॉ० यशवंत सिंह परमार तथा प्रदेश कांग्रेसाध्यक्ष सत्यावती डांग के प्रस्ताव पहाड़ी भाषा के इतिहास पर काफी रोशनी डालते हैं।

इस सारे संघर्ष में प्रदेश के साहित्यकार और विधायक स्व० लालचन्द प्रार्थी तथा भाषा विज्ञान के प्रकाण्ड पंडित (स्व०) हरिचन्द पराशर का योगदान भी पहाड़ी भाषा के इतिहास और साहित्य में हमेशा याद रखा जाएगा। विधायकों, राजनेताओं तथा भाषा विज्ञान के ज्ञाताओं के सांझे प्रयत्नों से पंजाब के पहाड़ी भाषी क्षेत्र प्रथम नवम्बर, १९६६ को हिमाचल प्रदेश के साथ मिलाये गए। इससे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि हिमाचल प्रदेश की अपनी अलग भाषा रही है। भले ही उसे मान्यता मिल सकी है या नहीं। इस सांझे रूप में प्रथम नवम्बर १९६६ से ही पहाड़ी भाषा की लहर तेज हुई। प्रदेश सरकार ने एक भाषा सलाहकार समिति का गठन किया। डॉ० यशवंतसिंह परमार तथा उनके साथी मन्त्री श्री लालचन्द प्रार्थी जी के सांझे प्रयत्नों से पहाड़ी भाषा के लेखकों को मार्गदर्शन मिला। पहाड़ी भाषा के इतिहास में डॉ० पीयूष गुलेरी तथा पं० पद्मनाभ त्रिवेदी के प्रयत्नों से सन् १९६७ ई० में एक साहित्यिक सम्मेलन का आयोजन कांगड़ा में किया गया। जिसमें पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश तथा हिमाचल प्रदेश व जम्मू-कश्मीर के सुविख्यात कवियों और साहित्यकारों ने भाग लिया। जम्मु-कश्मीर की डोगरी में प्रकाशित कुछ पुस्तकों की प्रदर्शनी भी लगाई गई। जिससे पहाड़ी भाषा के लेखक बहुत प्रभावित हुए। पहाड़ी भाषा के इतिहास में पहाड़ी साहित्य सभा, दिल्ली की भूमिका को भी नजरअन्दाज नहीं किया जा सकता। सन् १९७१ ई० में पहाड़ी साहित्य सभा, दिल्ली तथा अन्य सामाजिक संस्थाओं के सहयोग से एक राष्ट्रीय समारोह का आयोजन किया गया। सरकारी स्तर पर कवि दरबार, लेखक गोष्ठियां तथा कार्यशालाओं के आयोजन आरम्भ हुए। आकाशवाणी शिमला से पहाड़ी भाषा में कार्यक्रमों का प्रसारण आरम्भ हुआ। सन् १९६९ ई० में शिमला से हिमभारती पत्रिका का प्रकाशन आरम्म हुआ। प्रदेश के कालेजों से प्रकाशित होने वाली पत्रिकाओं में पहाड़ी अनुभाग की स्थापना की गई और उनमें पहाड़ी की सुन्दर रचनाएं प्रकाशित होनी आरम्भ हुई। इससे पहाड़ी भाषा के लेखकों तथा पाठकों की संख्या में निरन्तर वृद्धि आई। इसी कड़ी में प्रदेश के सभी पुस्तकालयों में पुस्तकों का पहाड़ी अनुभाग स्थापित हुआ। प्रो० नारायणचन्द पराशर, संसद सदस्य ने पहाड़ी भाषा को संविधान की ८वीं अनुसूची में जोड़ने के लिए पांचवीं लोकसभा में तथा इसके उपरान्त सातवीं लोकसभा में प्रस्ताव रखे। प्रो० साहिब के प्रयत्न अभी भी जारी हैं। पहाड़ी भाषा व साहित्य के विकास में स्वैच्छिक साहित्यिक संस्थाओं के योगदान को भी हमेशा याद किया जाता रहेगा।

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इसके पश्चात पहाड़ी भाषा के एक नए युग का सूपात हुआ। पहाड़ी में पुस्तकों का विधिवत प्रकाशन आरम्भ हुआ। इस कड़ी में सन् १९६९ ई० में डॉ० पीयूष गुलेरी का प्रथम पहाड़ी काव्य संग्रह “मेरा देश म्हाचल” प्रकाशित हुआ। इस पुस्तक की भूमिका में स्व० लालचन्द्र प्रार्थी लिखते हैं― “कुण गलांदा जे पहाड़ी बोलिया-च जान हाईनी जा सवाद हाईनी…. अपणी बोली कितणी मिठी तैं प्यारी दूर रिढ़िया तैं गीतां कनैं झंझोटिया रे बोल सुणोदे तां कालेजें लीक पेई जांदी। दिले दा कोई भाव ऐड़ा नहीं जिसो अपणी बोलिया मंझ बणाई-सजाई नीं सकदा।”

इसमें १४ कविताएं तथा १२८ पृष्ठ हैं। इस कविता संग्रह की एक कविता की कुछ पंक्तिया इस प्रकार हैं―

बांकी धौलाधार इत्थू, गदिदयां री नार इत्थू
छैल़ छैल़ अंग्गा आई बद्दल़ जी ढक्कदा
फौजां रा जुआन इत्थू गोरिया री शान इत्थू
कोई नीं पीयूष पाणे ताई तप सम्पदा।

(बांकी धौलाधार पृ० १२३)
घुघरे दी नार बांकी चीलां री कतार बांकी
हण मिंजो घुघरे दे ऐयो गुणा गाणा दे
ईह्यो लग्गे चीलां इह्नां शरमा ने झूंड पाणा
हल्ली-बी पटक याद मिजो दिन ठाणा दे

(घुघरे दी नार बांकी पृ० २९)

डॉ० गौतम व्यथित की पुस्तक “चेते” सन् १९७० की उल्लेखनीय रचना है। इस पुस्तक में कुल पृ० संख्या १५८ तथा ४७ कविताएं हैं। काव्य संग्रह की इसी कड़ी में डॉ० श्रीकांत प्रत्यूष द्वारा लिखित “गीतां री सीर” प्रकाशित हुई। इस पुस्तक के सम्बन्ध में डॉ० सिद्धेश्वर वर्मा ने अपने पत्र में इस प्रकार लिखा है― “‛धन तेरे माणुए जो।’ हमारी शब्द ब्रह्म परिषद की आगामी बैठक ४ अक्टूबर, १९७० में सुनाई जाएगी।” कविता का नमूना निम्न पंक्तियों में प्रस्तुत है―

धन तेरे माणुआ जो परमेसरा
उड़ैं जाई जाई अज उच्चेया आकास वे
पंख पखेरू नीं पुज्जे जित्थू अज्हैं जाई
दिक्खी आया माह्णु तेरा अक्खां नजारे बे

(धन तेरे माणुएं जो पृ० २६)

पहाड़ी लोकगीतों को इकट्ठा किया जाना अत्यन्त आवश्यक है। इस सम्बन्ध में कुछ कार्य हुआ भी है लेकिन लोकगीतों की सही संख्या मालूम करने के लिए इनके प्रलेखन की आवश्यकता तो रहेगी ही। लोक गीतों के कुछ संग्रह अभी तक प्रकाश में आए भी हैं। इनमें स्व० पं० टीकाराम जोशी का किन्नौरी गीतों का संग्रह (अंग्रेजी) “एथनोग्राफी ऑफ बुशहर स्टेट” शीर्षक से प्रकाशित हुआ है। लोक गीतों का यह प्रथम संग्रह माना जा सकता है। इसके बाद डा० एम० एस० रंधावा का “कुल्लू तथा कांगड़ा के लोक गीत”, लोक सम्पर्क विभाग द्वारा प्रकाशित “हिमाचल के लोकगीत” देखने को मिलते हैं। इसी में श्री एस० एस० एस० ठाकुर की पुस्तक “हिमाचली लोक लहरी” सन १९७१ में प्रकाशित हुई। इस पुस्तक की भूमिका में स्व० लालचन्द प्रार्थी लिखते हैं― “हिमाचल में लोकगीतों का एक बड़ा जखीरा था। बदली हुई परिस्थतियों में दिन व दिन इसका लोप होता जा रहा है। कई वर्षों से मेरी यह हार्दिक इच्छा रही है कि इस जखीरे को सुरक्षित किया जाए। लोक विधा के विद्वानों और विद्यार्थियों से मेरी यह सदा से अपील रही है कि वे इस जखीरे को लिपिबद्ध करें और संगीत के विद्वान इन पुराने गीतों के अधिक से अधिक…. संस्कृति की धरोहर बनी रहे।”

“चंगेर फुल्ला री” पुस्तक राज्य भाषा संस्थान द्वारा सन् १९७१ में प्रकाशित हुई। इस पुस्तक में कुल १० निबन्ध ४२ पृष्ठों में छपे हैं। पुस्तक के आखिर में पहाड़ी-हिन्दी रूप भी दिया गया है। चक्रधारी शास्त्री की “नाटक ठुडुग्गरे दा कविता नूरपुरे दी” शीर्षक से सन् १९७१ में प्रकाशित पुस्तक है। इस पुस्तक में डोगरी तथा पहाड़ी का सुन्दर प्रयोग हुआ है। इस पुस्तक में १३ एकांकी व १३ कविताएं शामिल हैं। भ्रमर गीत कविता के कुछ अंश देखिए―

उनां गोकला दे विच होण नईं औणा
मोहने दे कन्नैं असां आसां ले लाईयां
प्यारे दियां गले विच फाईया जे पाइयां

(पृ० २८)

सन् १९७१ ई० में शेष अवस्थी की पुस्तक “धारा दिया धुप्पा” शीर्षक से काव्य संग्रह के रूप में प्रकाश में आई। इस काव्य संग्रह में १८ कविताएं कुण्डलियों सहित ६८ पृष्ठों में हैं। एक कुण्डली का रूप प्रस्तुत है―

गल्लां कुदियां कुण सुणे, अपणी खाह-फतह
हल्ला रोला सेवा दा स्वायें फसीही रूह
स्वार्थे फसीहो रूह दखोआ चौंही पास्से
जीण जियोणा लग्गा, झूठें दिएं ई आस्सें
शेष गलाए सच कोई, तां उपड़न खल्लां
लगणा लगियां सच अज्ज स्याणेयां दियां गल्लां

(पृ० ६५)

राज्य भाषा संस्थान शिमला द्वारा “प्रेखण” शीर्षक के अन्तर्गत एकांकी नाटकों का संकलन भी सन् १९७१ ई० में ही प्रकाशित हुआ। इसमें ९ एकांकी ९३ पृष्ठों में सम्मिलित हैं। इस पुस्तक के आखिरी ३ पृष्ठों में कठिन शब्दों के अर्थ भी दिए गए हैं। इसी वर्ष पहाड़ी कहानियों का संकलन भी राज्य भाषा संस्थान द्वारा “बरासा रे फुल्ल” शीर्षक के अंतर्गत प्रकाशित हुआ। इसमें ९ कहानियां हैं। इस पुस्तक के अंत में भी पहाड़ी भाषा के कठिन शब्दों के अर्थ दिए गए हैं।

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सन् १९७२ ई० में कुलभूषणचन्द्र कायस्थ द्वारा कहानियों की एक पुस्तक “रींगदी पीड़” प्रकाशित हुई। इसमें १२ कहानियां हैं और पुस्तक के कुल पृष्ठ ९२ हैं। इसी वर्ष भगतराम मुसाफिर द्वारा पहाड़ी काव्य संग्रह “मेरा छैल हिमालय” शीर्षक के अर्न्तगत प्रकाशित हुआ। इस संग्रह में कुल १२४ पृष्ठ तथा ५० कविताएं सम्मिलित हैं। वंदना में कवि लिखता है―

ओ सुण ओ अम्मा मेरिये, मेरी दुखां भरी फरियाद
तां जे हूंओ माहणू दुखिया, तियो तांई सैह करां याद
जे हूंओ राजी बाजी तां रेह्यां तूं तैं दूर
तूं जाणा है रमजां सभ दियां, तूं तोड़ां ई सबदा गरूर।

अपनी “वीरभूमि” कविता में कवि अपने विचार निम्न रूप में प्रस्तुत करता है―

मेरी कांगड़ा भूमि सबसे न्यारी
इत्थू बसदे लक्खां नर-नारी
एह खांदे सादा पहनदे सादा
ए गलांदे गला कोई नि माड़ी

(पृ० ९५)

“कूंजा दी कुक” काव्य संग्रह ऋखी भारद्वाज द्वारा इसी वर्ष में निकाला गया। इसमें २६ कविताएं ६३ पृष्ठों में शामिल की गई हैं। एक कविता में कवि लिखता है―

लसाका मारे गोटा तेरी घगरी दा
हाए छुटी जाए सूटा मेरी झझरी दा

(पृ० ४४)

इसी वर्ष देवराज शर्मा द्वारा “लाल चादरूए दी किंगरी” शीर्षक के अन्तर्गत कहानी संग्रह प्रकाशित किया गया। इस संग्रह के ६० पृष्ठों में ९ कहानियां हैं।

भाषा एवं संस्कृति विभाग द्वारा शोध पत्रावलियों के प्रकाशन का क्रम आरम्भ किया गया था। इस कड़ी में वर्ष १९६८ में प्रथम शोध पत्रावली प्रकाशित हुई। यह क्रम बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ परन्तु अब पता नहीं किन परिस्थितियों के कारण इसे बन्द कर दिया गया है, जिससे पहाड़ी साहित्य की समालोचना पर काफी असर पड़ा है।

आधुनिक पहाड़ी साहित्य की लगभग १०० पुस्तकें सन् १९६८ से १९७२ तक प्रकाश में आई हैं। सन १९७४ ई० में श्री खुशीराम शास्त्री की पुस्तक “कांगड़ें दी संस्कृति कनैं लोक जीवन” प्रकाशित हुई। इस पुस्तक के आरम्भ में प्रो० नारायणचन्द्र पराशर लिखते हैं― “पहाड़ी लोक जीवन दा सेह्ई रूप लोका दे साह्मणे आई सके इस पास्सैं हर इक जतन उत्तम दिशा दे पासैं इक कदम ऐ।” इस पुस्तक के कुल २५ अध्याय और ११८ पृष्ठ हैं। पुस्तक के अंत में लेखक ने कांगड़ा गुणगान पहाड़ी कविता में किया है। यह एक सुन्दर प्रयास है।

सन् १९७४ ई० में “पुंगरासा” शीर्षक से डॉ० गौतम व्यथित द्वारा प्रकाशित काव्य संग्रह है। इस संग्रह के कुल १२० पृष्ठों में ६० कविताएं दी गई हैं। “दुनियां दौड़ा दी” के अंश देखिए―

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दुनियां दौड़ा दी हर कोई इक्की दूए ते अगाहं
बधणे दा अणथक जोर लगादा
सुक्का दा संघा
छा दा न्हेरखड़ा
बझोआ दी हार
पर भी बी धीखणा
अगांह धक्का देआ दा

(पृ० ८४)

सन् १९७४ ई० के अन्त में देवराज शर्मा की पुस्तक “घाटियां री गूंजा” प्रकाश में आई। इसमें बिलासपुर क्षेत्र की ५१ लोक कथाएं सम्मिलित की गई हैं। लोक कथा संग्रह, लोक संस्कृति की पहचान के लिए अपना एक अलग स्थान रखता है। इसी कड़ी में शेष अवस्थी ने “स्हड़ेयो फुल” शीर्षक के अर्न्तगत लोक कथा संकलन निकाला। इसमें २६ लोक कथायें हैं। १९७४ ई० में पहाड़ी भाषा में पहला उपन्यास “माहणू शिखरा रे” शीर्षक के अंतर्गत रूप शर्मा द्वारा प्रकाशित किया गया। इससे पूर्व इनका सन् १९७० ई० में पहाड़ी काव्य संग्रह “मेरा हिमाचल मेरा घर” शीर्षक से प्रकाशित हुआ था। जिसके कुल ७४ पृष्ठों में ३० कविताएं सम्मिलित की गई हैं।

सन् १९७५ ई० में श्री सी० आर० बी० ललित ने “जुएणो रे आशू” शीर्षक के अंतर्गत पहाड़ी काव्य संग्रह निकाला। पुस्तक में संदेश रूप में भूतपूर्व मुख्यमन्त्री लिखते हैं― “अपनी भाषा को समृद्ध और स्वस्थ बनाना हर हिमाचली का कर्तव्य है।” पुस्तक के ८० पृष्ठ हैं और उनमें ३७ कविताएं शामिल की गई हैं। “रूप मेरी मीतो रा” कविता में कवि के भाव देखिए―

पुनओ रा चांद असौ रूप मेरी मीतो रा
एकी एकी अदारा रा औ भान केती गीतो रा
कली रा निखार मिलौ फुलौ न्होर सूखौ
लागौ से अजंता अलौरा रे और मूरतो
ऋषे मु छोड़ दैऔ देखे खता नीगैरा।

सन् १९७५ ई० में भाषा एवं संस्कृति विभाग द्वारा पहाड़ी लेखमाला का प्रकाशन किया गया। इस लेखमाला के १६२ पृष्ठों में २३ लेखकों के लेख मिलते हैं। रूप शर्मा के काव्य संग्रह “फूल कनैं पत्ते” में ७३ कविताएं ६६ पृष्ठों में शामिल की गई हैं। इसी वर्ष भाषा एवं संस्कृति विभाग की ओर से पहाड़ी एकांकी संग्रह “सोलह सींगी’ शीर्षक के अर्न्तगत प्रकाश में आया। इस संग्रह में १६ एकांकी नाटक हैं। महाकवि कालिदास के विक्रमोइंशीय का पहाड़ी अनुवाद पं० दुर्गादत्त शास्त्री द्वारा निकाला गया। पहाड़ी कवियों की कविताओं के चार प्रतिनिधि संकलन भाषा एवं संस्कृति विभाग द्वारा प्रकाशित किए गए। “चिट्टी चांदनी” विद्यानन्द सरैक द्वारा निकाला गया काव्य संग्रह है। पुस्तक के १०४ पृष्ठ हैं। इनकी एक कविता के अंश प्रस्तुत हैं―

डाल़ी डाल़ी रा बसेरा, पंछिया मुश्किल जीवण तेरा।
एकी फुलडु मुणे म्हाइस लाणा जिवटा पोरा।।

(पृ० ४५)

सन् १९७५ ई० में प्रेम शास्त्री द्वारा “पहाड़ी मुहावरे” पुस्तक निकाली गई। मित्र साहित्य घुमारवीं द्वारा “फुल्ल कनै पत्ते” शीर्षक के अंतर्गत पहाड़ी काव्य संग्रह प्रकाशित किया। “लामण” पुस्तक देवप्रस्थ साहित्य संगम, कुल्लू का प्रयास है। इस पुस्तक में लामण गीतों का सम्मिलित किया गया है। ठाकुर मौलूराम द्वारा “पहाड़ी भाषा: कुल्लू के संदर्भ में” सन १९७५ ई० में प्रकाशित की गई। इस पुस्तक की डॉ० सिद्धेश्वर वर्मा और डॉ० हरदेव बाहरी द्वारा भूरि-भूरि प्रशंसा की गई। पहाड़ी भाषा की यह पुस्तक भाषा वैज्ञानिकों तथा शोध कर्ताओं के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

सन् १९७६ ई० में हिमाचल कला, संस्कृति और भाषा अकादमी द्वारा “माल़ा रे मणके” डॉ० पीयूष गुलेरी, हरिचन्द पराशर, मौलूराम ठाकुर तथा बंशीराम शर्मा के सम्पादन में प्रकाशित हुई। इस पुस्तक में पहाड़ी कविताओं का हिन्दी रूपान्तर भी दिया गया है। इसमें ४३ कवियों की ६३ रचनाएं सम्मिलित हैं।

सन् १९७६ ई० में ओंकारलाल भारद्वाज द्वारा “गोरी छैल लगदी” शीर्षक के अन्तर्गत पहाड़ी काव्य संग्रह निकाला गया। इस पुस्तक के ४० पृष्ठों में ९१ कविताएं सम्मिलित हैं। कवि अपने दो शब्दों में अपने उद्गार इस प्रकार प्रस्तुत करता है―

कौण भलाणां यादां तेरी मिल छोड़े हण ला न देरी
तेरे नैणां च मेरा संसार, तेरे कजरारे नैणा री धार

(पृ० १५)

इसी वर्ष सोहनलाल गुप्त और तेजसिंह पंवार ‘अनजान’ का संयुक्त काव्य संग्रह “नवां मोड़” शीर्षक के अंतर्गत निकला। यह दो भागों में विभक्त है। प्रथम भाग में गुप्त की ३५ कविताएं और दसरे भाग में ‘अनजान’ की ४१ कविताएं सम्मिलित हैं। गुप्त की कविता के अंश देखें―

इस भल किती केए से ध्याड़े भरदे थे पेड़ियां बंदे थे न्यारे
तां ही जुल्मां तई डटे थे सारे हसदे नचदे लोकां सिर वारे।

अब ‘अनजान’ की कविता की पंक्तियां देखिए―

कलए तेरे कर्म ई ऐड़े न चाहन्दे बी चाह करी लाओ
संसारो री रीत ई लड़ीए मतलब कडढ़ी परदेसी तणी जाओ।

राजागोपाल शर्मा का “विधवा बजोगण” ११ पृष्ठों में पहाड़ी खण्ड काव्य है। कविता के अंश देखें―

इस वास्ते जवानिया दा रंडेया मिटाई लैणा चाहीदा
जवानिया दे रंडेये पर दूसरा व्याह रचाई लैणा चाहीदा
पर मैं एह गल्त गलाई नी संकदी
किसी जो एक गल्ल सुणाई नी सकदी।

(पृ० ११)

सन् १९७७ ई० में ही डॉ० गौतम व्यथित के संयोजन में लोक साहित्य परिषद कांगड़ा की ओर से “मिंजरां” काव्य संकलन निकाला गया। इस संकलन में २७ कवियों की कविताएं सम्मिलित हैं। संस्था का प्रयास सराहनीय है और ऐसे संकलन उन लेखकों के लिए बराबर लाभदायक रहे हैं जो अपनी रचनाओं को पुस्तककार में नहीं पा सकते। इसी वर्ष शबाब ललित द्वारा पहाड़ी गजलों व कविताओं का संग्रह “भागसू दे नौणें” शीर्षक के अन्तर्गत प्रकाशित हुई। इस संग्रह में ३५ कविताएं शामिल हैं। एक कविता का नमूना पेश है―

भागसू दे नौणें गोरी न्हाई करी चली गेई
मड़ी अग्ग पाणीये च लाई करी चली गई।

(पृ० १७)

सन् १९७७ ई० में धर्मपाल कपूर द्वारा “तिखेणी” काव्य संग्रह निकाला गया। इसमें ५० कविताएं तथा १५५ पृष्ठ हैं। कवि के भाव देखें―

दूर परदेशा याद बड़ी आंवां ही
चांदा रे झरोखे मंझा तू चली आवां ही।

(पृ० १५५)

सन् १९७७ ई० में “पंडित ज्वालाप्रसाद स्मारक ग्रंथमाला” शीर्षक के अन्तर्गत वैदिक मन्त्रों व श्लोकों का पहाड़ी अनुवाद यशोदा प्रकाशन सुजानपुर टीहरा से प्रकाशित हुआ। इस ग्रंथ में भले ही अनुवादक ने अपना नाम नहीं दिया है परन्तु यह विदित ही है कि इसके अनुवाद का कार्य डॉ० श्यामलाल डोगरा द्वारा ही हुआ है। १९७७ ई० में चक्रधारी शास्त्री द्वारा गीत गोविन्द (महाकवि जयदेव) का पहाड़ी अनुवाद “गीत गोविन्दम्” शीर्षक के अर्न्तगत प्रकाशित हुआ है। इसके ८४ पृष्ठ हैं। कथा सरवरी भाग-१ भी सन् १९७७ में प्रकाशित हुई। अब तक इसके दो भाग प्रकाशित हो चुके हैं। इस पुस्तक के ८४ पृष्ठ हैं और यह हिमाचल कला, संस्कृति और भाषा अकादमी द्वारा प्रकाशित की गई है। सन १९७७ में “लोसरा रे फुल” भाग-२ भाषा एवं संस्कृति विभाग द्वारा प्रकाशित किया गया है। इसमें ३८ पहाड़ी कहानियां २०६ पृष्ठों में सम्मिलित की गई हैं।

सन् १९७७ में डॉ० गौतम व्यथित द्वारा “झूमे धरती गाये लोक”, काहनसिंह जमाल द्वारा “गिरी गांगे री धारा”, डॉ० प्रत्यूष गुलेरी द्वारा “मनें दी भड़ास”, तथा मास्टर लाल द्वारा “नोखियां गल्ला” पुस्तकें प्रकाश में आई हैं।

सन १९७९ में कर्मचन्द द्वारा लिखित “बंडेरा दे कण्ढे”, डॉ० आत्मा राम द्वारा लिखित “चुंगा ते ठोलू” रचनाएं प्रकाशित हुई हैं।

सन् १९८० में डॉ० पीयूष गुलेरी का काव्य संग्रह “छौटे” निकला। इसमें २४ कविताएं ८८ पृष्ठों में छपी हैं। यह पुस्तक स्व० लालचन्द प्रार्थी जी को समर्पित है। इस पुस्तक पर डॉ० गुलेरी को अकादमी पुरस्कार भी प्राप्त हुआ है। “नगारे दी चोट” शशिकांत शास्त्री का काव्य संग्रह है। इसके ९० पृष्ठ तथा ५० कविताएं विभिन्न पहलुओं पर लिखी गई हैं। एक कविता के अंश प्रस्तुत हैं―

कुसी री गिद्दड़ भबकियां कन्नैं
असां नी डरने आल़े
असां मौता ने खेलना सिक्खे
असां नी झुकणे आल़े

(पृ० २६)

सन् १९८१ ई० में कुल्लू के बुजुर्ग कवि चन्द्रशेखर बेबस द्वारा “कुल्लू रै चैह्कदे तीतर चाकर”, भगत राम मुसाफिर द्वारा एक और काव्य संकलन “मेरे सुपने मेरे गीत”, देवराज शर्मा द्वारा “जीणा म्हाचले दा” काव्य संकलन प्रकाशित हुए हैं।

श्री भगवद्गीता का संस्कृत मूल तथा पहाड़ी अनुवाद डॉ० श्यामलाल डोगरा द्वारा सन् १९८२ ई० में यशोदा प्रकाशन सुजानपुर टीहरा से निकाला गया। सन् १९८२ में ही हिमाचल कला, संस्कृति और भाषा अकादमी द्वारा “संस्कार गीत” के अर्न्तगत एक पुस्तक प्रकाशित की गई। इस पुस्तक के २०० पृष्ठ हैं और उनमें १९ जनपदों के अलग-अलग गीत सम्मिलित हैं। इन गीतों का हिन्दी अनुवाद इस पुसतक की विशेषता है।

डॉ० कांशीराम आत्रेय द्वारा “हिमाचली लोक साहित्य मंजूषा” शीर्षक के अर्न्तगत पुस्तक निकाली गई है। इसमें प्रकाशन वर्ष नहीं दिया गया है। पुस्तक छोटे आकार में है परन्तु सामग्री की दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण है। खुशीराम शास्त्री द्वारा लिखित “कांगड़े दियां, लोक कथा” पुस्तक पर भी प्रकाशन वर्ष नहीं दिया गया है। इसमें कुल २७ लोककथाएं सम्मिलित हैं। “धम्मपद” बौद्ध धर्म का बहुत मल्यवान ग्रंथ है। इस ग्रंथ का पहाड़ी अनुवाद प्रो० नारायणचन्द पराशर द्वारा सन् १९८३ प्रकाशित हुआ। पुस्तक साज-सज्जा तथा छपाई की दृष्टि से अति-उत्तम है।

सन १९८३ ई० में भाषा एवं संस्कृति विभाग द्वारा “हिमाचली लोक गीत भाग-१” का प्रकाशन किया गया। इस पुस्तक के ३१२ पृष्ठ हैं। इस पुस्तक में लोकगीत, लोकगाथायें, श्रृंगार गीत, त्यौहार गीत शामिल किए गए हैं।

“उछटी मारनी डिया”, डॉ० वरयामसिंह का काव्य संग्रह है। इस संग्रह पर सोवियत भूमि नेहरु पुरस्कार भी दिया गया है। पुस्तक के कुल ३१ पृष्ठ हैं और इनमें २५ कविताएं सम्मिलित की गई हैं। एक कविता की कुछ पंक्तियां देखें―

मंणश असा बिण हो फि आखा रौचेलू
उछटी मारदा सौ आपणे खिआला मज़ै डिया।

(पृ० ११)

डॉ० कांशीराम आत्रेय द्वारा सन् १९८४ ई० में लोक साहित्य का तीसरा भाग निकाला गया। इस पुस्तक के कुल ७२ पृष्ठ हैं। मण्डी के बुजुर्ग साहित्यकार पं० भवानीदत्त शास्त्री द्वारा “लेरा धारा री” शीर्षक के अर्न्तगत काव्य संग्रह निकाला गया। इस संग्रह पर श्री शास्त्री जी को अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। पुस्तक में कुल ३९ कविताएं ७६ पृष्ठों में संकलित हैं। एक कविता के अंश देखें―

हाथा पर हाथ धरी उमर गवांदा तू
अलबेले नकटेया, जाण्ढे कि नी लान्दा तूं।

(पृ० ४९)

वर्ष १९८४ ई० में स्व० शमशेरसिंह द्वारा मैक्सिम गोर्की के उपन्यास “माँ” का पहाड़ी अनुवाद निकाला गया। पुस्तक के ४६० पृष्ठ हैं। इससे पहले भी इन्होंने ७-८ पुस्तकों के बिलासपुरी उपभाषा में अनुवाद किए हैं।

सन् १९८४ ई० में बालकराम भारदाज द्वारा गीता का अनुवाद “कृष्ण-अर्जुन संवाद” शीर्षक के अंतर्गत मित्र साहित्य परिषद, घुमारवीं की ओर से निकाला गया। भगतराम मुसाफिर द्वारा १९८४ में एक और पहाड़ी काव्य संग्रह “बणी ठणी गोरी चली” शीर्षक के अन्तर्गत प्रकाश में आई। इस पुस्तक में ३२ कविताएं संकलित हैं। कविता के अंश प्रस्तुत है―

जड़क मड़क चाल नोखी
पत्थर मिटिया भनदी जाओ
उचे सैंडल छूए अम्बर
अडिए नै अडी बजदी जाओ

डॉ० गौतम व्यथित द्वारा एक और काव्य संग्रह “गास्सें हत्थ पुजाणे किया” शीर्षक के अन्तर्गत निकाला गया। पुस्तक में ४६ गजलें ६४ पृष्ठों में संगृहीत हैं। एक गजल का नमूना पेश है―

पाई नैं सौं सौंकिया अप्पू लुकी किया
उमरा दे हाणी तेरे, भमदे भमी गै

(पृ० ३७)

डॉ० व्यथित की और बहुत सी रचनाएं प्रकाशित हुई हैं, जिनमें “पहाड़ा रे अत्थरु”, “ढोलरू” आदि प्रमुख हैं।

बी० आर० मुसाफिर द्वारा “घर-कुदाल” (एकांकी नाटक), सागर पालमपुरी द्वारा “मैं बणजारा गीतां दा” (पहाड़ी काव्य), भाषा एवं संस्कृति विभाग द्वारा “काव्य धारा भाग-४” हरिकृष्ण मुरारी द्वारा “धरती सुरग बणाणी” (काव्य संग्रह), देवराज संसालवी द्वारा “लोक कथाएं” तथा हिमाचल कला, संस्कृति और भाषा अकादमी द्वारा वर्ष १९८६ में भट्ट नारायण की पुस्तक “वेणी संहार” का पहाड़ी रूपान्तर प्रकाश में आये हैं। इस पुस्तक का पहाड़ी अनुवाद ‘निर्मोही’ ने किया है। इस पुस्तक के दो शब्दों में अकादमी के अध्यक्ष तथा प्रदेश के (भूतपूर्व) मुख्यमंत्री श्री वीरभद्रसिंह जी लिखते हैं― “किसी भी भाषा के साहित्य के विकास में मौलिक साहित्य रचना के अतिरिक्त अनुवाद का विशेष महत्व है। विभिन्न भाषाओं से प्रमुख पुस्तकों के अनुवाद द्वारा न केवल भाषा विशेष के साहित्य में वृद्धि होती है वरन् उस भाषा के पाठकों को दूसरी भाषा का साहित्य भी पढ़ने को उपलब्ध होता है।”

नरेन्द्र अरुण का “नवां सवेरा’” खण्ड काव्य, है। इसके ११० पृष्ठ हैं। श्री अरुण, नाटक, कविता, निबन्ध अनुवाद आदि विधाओं के जाने-माने साहित्यकार हैं। इनकी रचनाओं में “रंग-बिरंगे फुल्ल”, “लद्दाख कनारे”, “कुज्जी के फूल” और “पुण्यरथी” (रश्मिरथी का पहाड़ी अनुवाद) प्रमुख रचनाएं हैं। “रंग-बिरंगे फुल्ल” पर इन्हें अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। खण्ड काव्य की परम्परा में मनसाराम अरुण, शेष अवस्थी, नवीन हलदूणवी, संसारचन्द प्रभाकर के नाम भी उल्लेखनीय हैं। अनुवाद के दृष्टिकोण से भी पहाड़ी में पर्याप्त साहित्य रचा गया है। पं० भवानी लाल शास्त्री द्वारा पहाड़ी में श्रीमद् भगवद्गीता का अनुवाद प्रकाश में आया है। इसके अतिरिक्त आचार्य कर्मसिंह शास्त्री द्वारा स्वप्नवासवदत्तम् (पहाड़ी अनुवाद) और केनोपनिषद् (पहाड़ी हिन्दी रूपान्तर) भी प्रकाशित हुए हैं।

सन १९८९ में डॉ० प्रत्यूष गुलेरी द्वारा “वक्ते दी गल्ल”, कुलदीप वरजाता की “स्हाड़ी सभ्यता’ आदि विशिष्ट कृतियां पाठकों को उपलब्ध हुई हैं। हिमाचल अकादमी द्वारा प्रकाशित “पहाड़ी-हिन्दी शब्दकोश” पहाड़ी भाषा के संरक्षण, संवर्धन व मानकीकरण की दिशा में एक मील का पत्थर साबित होगा। तथा इससे भाषायी व सांस्कृतिक अध्ययन का मार्ग भी विकसित हो सकेगा।

उपरोक्त तथ्यों से यह स्पष्ट होता है कि पहाड़ी भाषा का अपना एक गौरवपूर्ण इतिहास है। राजाश्रय और कई कवियों व लेखकों के सार्थक प्रयत्न से पहाड़ी भाषा में इस क्षेत्र की संस्कृति के इतिहास की महत्वपूर्ण विरासत सुरक्षित है। अनेकों शिलालेख अभी तक भी शोधकर्ताओं के लिए आश्चर्य का विषय बने हुए हैं। भाषा वैज्ञानिक अध्ययन के परिप्रेक्ष्य में अभी तक बहुत कुछ किया जाना भविष्य के गर्भ में है। पुनरपि पहाड़ी भाषा का साहित्य अपनी ऐतिहासिक विरासत को संजोए हुए उज्ज्वल भविष्य की और अनवरत गतिशील है। जिससे विकास की संभावनाएं प्रबल हैं।

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1 Response

  1. डॉ.यज्ञदत्त शर्मा says:

    डॉ.यशवन्वत जी जैसे नेताओं को टांकरी लिपि को हिलाचली लिपि के रुप में स्थापित करना चाहिए था| कितना अद्भुत होता|

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