कुल्लू का मोहक लोक-नृत्य: नाटी

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हिमाचल कला, संस्कृति एवं भाषा अकादमी की त्रैमासिक शोध पत्रिका सोमसी के वर्ष 2 अंक 3 (जुलाई 1976) में छपा पुरोहित चन्द्रशेखर ‘बेबस’ जी का एक लेख।

महाभारत में किसी ‘उत्सव क्षेत्र’ का उल्लेख मिलता है। वह ठहरता तो हर हाल में हिमाचल प्रदेश में ही है पर कुछ विद्वानों ने उसे किन्नौर जिला या शतुद्र घाटी अनुमाना है, जबकि गहराई से बाचने, जांचने और ‘उत्सव संकेत’ शब्द के भावों और लक्षणों के मिलाने से यह कुलूत संभाग ही अधिक सम्भावित है, जहां ‘नृत्य उत्सव’ दिनचर्या की भांति जीवन का अभिन्न सा अंग हो कर व्याप्त है। एक तो यहां देउ (देव) पूजा इतनी व्याप्त है कि प्रत्येक कुल, ग्राम और क्षेत्र के देवताओं का कोई न कोई उत्सव जिसे स्थानीय भाषा में ‘उछ़व’ कहते हैं, प्रायः होते ही रहते हैं। उन में अथवा संस्कारों, त्यौहारों, रूहणी (धानरोपण), भारी वस्तु के ढोने आदि अनेक सामूहिक या वैयक्तिक कामों में जहां 10-12 से अधिक आदमी काम करें वहां उन के प्रोत्साहन के लिये बाजे का भी प्रबन्ध रहता है। और बीच बीच में विश्रांति के लिये कार्यकर्ता नाच पड़ते हैं। कभी कभी तो बोझे सहित भी उछल पड़ते हैं और सचमुच का बाजा न हो सका हो तो मुंह से साजों के बोल बजा कर चाव पूरा कर लेते हैं। इसी प्रकार जब किसी या किन्हीं द्वारा कोई लोकगीत गाया जाता है तो बीच में ताल के लिये मुंह की ढोलकी काम चला लेती है। इस से लोग बच्चों को भी हथेली या कन्धों पर बैठाकर उछालते-नचाते हैं, ये सब नाटी की ही नकल या शाखायें सी होती हैं। यही संभाग ऐसा है जहां के लोग अपने देवताओं को भी अपने संग नचाते हैं। हां, उन की मूर्ति या पालकी को नाटी के ताल पर उछालते हैं। वहीं दूल्हा की पालकी को भी नचाते हैं। ब्याह में दूल्हा को मेल की मोहरी (सिरे) पर नाचने में जुटा कर सारे बड़े सम्बन्धी उस पर पैसे वार (न्योछावर) कर हेसी को देते हैं। हेसी आदि का वर्णन आगे की पक्तियों में करेंगे। ऐसा यह उत्सवी प्रदेश ही यदि विद्वानों के दृष्टिगोचर हुआ होता तो ‛उत्सव संकेत’ ठहराया गया होता।

इन उत्सवों का मूल है यहां का प्रसिद्ध लोक नृत्य ‘नाटी’। नाटी शब्द के बारे में बहुत से लोगों ने भांति भांति की अटकलें लगाई हैं परन्तु नाट्याचार्य भरत मुनि के नाट्य शास्त्र में इसका अति सरल समाधान उपलब्ध है। वे लिखते हैं “नृत, नृत्यं तथा नाट्यम् त्रिविध नृत्य मुच्यते” अर्थात् नृत्य के तीन भेद होते हैं― नृतं, नृत्यं तथा नाट्य। फिर आगे एक श्लोक द्वारा इन के लक्षण लिखते हुए वे नाट्य का लक्षण बताते हैं कि जिस नाच में साथ साथ गाना भी गाया जाता रहे वह ‘नाट्य’ कहलाता है। यह लक्षण भी नाटी में पूरा उतरता है; जब कि सारी नाटी में गाने का क्रम जारी रहता है। अतः नाटी शब्द ‘नाट्य’ का ही तद्भव रूप है। और भी बहुत से शब्द और सिद्धांत भरत जी के शास्त्र से मेल खाते हैं जिन से भी आभास मिलता है कि नाटी का नाट्यशास्त्र मूल या प्रेरणा स्रोत रहा होगा।

नाटी के भी किसी सर्वांग शास्त्र की भांति अलिखित सिद्धांत, मान्यताएं, नियम, विधि-निषेध और प्रविधि आदि है। इस का सम्पूर्ण वाद्य-वृंद (Orchestra) है, बहुत से साज हैं तथा ताल हैं। तालियों, मात्राओं युक्त यह नाटी-नृत्य परम्परागत अलिखित ‘नाटी शास्त्र’ पर अधिक आधारित है। यह तो हुआ नाटी शब्द का विवेचन। अब थोड़ा इसका भूगोल और इतिहास का परिचय भी लीजिये। इतिहास की दिशा में तो यही कहना होगा कि नाटी का जो वर्तमान प्रचलित रूप है, इसे ‘सराजी नाटी’ कहते हैं। स्मरण रहे, कुल्लू जिला के तीन मुख्य भाग हैं― कुल्लू उप-मंडल, भीतरी सराज उप-तहसील और बाहरी सराज उप-मंडल। नाटी का सम्बन्ध भीतरी सराज से है। इस का उद्भव भले ही कहीं हुआ हो परन्तु यह पल्लवित, पुष्पित और विकसित भीतरी सराज में ही हुई है। हां, इसका रूप भीतरी सराज, वर्तमान अन्दरूनी सराज से भिन्न मण्डी जिला का संलग्न क्षेत्र जिसे मण्डी सराज कहते हैं, (जिनकी बोल-चाल रीति-रिवाज समान हैं) को भी अपने साथ लिये है। शनोर-बदार, ज्वालापुर आदि क्षेत्र भी इस में सम्मिलित हैं। यह सारा क्षेत्र अर्थात् दोनों सराज तथा कुल्लू के अन्य भाग इस ‘नाटी क्षेत्र’ में आते हैं। शिमला जिला में भी इस नाटी का प्रचलन बढ़ रहा है। कुल्लू तहसील में तो इसे ‘सराजी नाटी’ पहचानना अतीत की बात होती जा रही है। तालों को व सराजी राग को बड़े बूढ़े ही पहचानते हैं। हां, सचमुच नाटी को यदि गीत अर्थात् शब्द यदि कुल्लू ने दिया है तो स्वर, ताल और गति भीतरी सराज से मिली है। आज भी यह क्षेत्र नाटी पर अपना प्रभाव और अधिकार बनाये हुए है। नाटी की मौलिकता और कला का उत्कर्ष यहीं सुरक्षित है। यह कुल्लू तहसील के भी रग रग में व्याप्त हो चुकी है।

नाटी बहुत भांति के नाचों का समष्टि-नाम है। कत्थक आदि नृत्यों की भांति इस की बहुत सी जातियां, नाम और रूप हैं। यथा ढीली-देसी, फेटी, तिणकी, बसाहरी, दोहरी, लाहुली, चम्बयाली, बाखली, काहिका, हुळकी, उजगजमा, गढ़ गढ़ेकर, खड़ायत, बांठड़ा, लूडी, तरासे आदि। क्षेत्र-भेद से इन की संख्या और नामों में अन्तर भी पाया जाता है, और क्रम-भेद भी हो सकता है।

वैसे नाटियों का नामकरण उनके तालों पर हुआ है। ऊपर लिखे नाम तालों के ही हैं, जैसे―कहरवा, दादरा, चांचर, तीन ताल आदि। पखावज के ताल बजते हैं। इन साजों को यहां ‘भांडे’ कहते हैं। जब कि ‘भरत नाट्यम’ में भी ‘भांड’ ही साज शब्द का पर्याय है, यथा―“यत्राभिनेयं गीतं स्यात्तत्र वाद्यं न योजयेत्”। (अध्याय 4, श्लोक 276) अर्थात् जो गाना किसी पात्र द्वारा अभिनय स्वरूप गाया जाय, उसमें साज न बजाये जायें। ये भांडे होते हैं―शहनाई, ढोलकी, ढोल, नगारे या नर्गा, करनाल, तथा भाणा। नरसिंगा (रणसिंहा) तो मात्र शोभा यात्रा में बजाया जाता है। ढोलकी और भाणा के इलावा सभी भांडे दो से कम तो काम चलाउ ही स्थिति में सकारे जाते हैं, अधिक भले ही कितने भी हों। शहनाई जिसे यहां ‘सन्हा’ कहते हैं, नाटी की प्राण होती है। कुल्लू की सन्हा बिस्मिल्ला की या भोटिया शहनाई से तो आकार और स्वर में भिन्न होती ही है कांगड़ा आदि की सन्हा से भी आकार में कुछ छोटी और स्वर में भी महीन तीखी होती है। अच्छी सुरीली सन्हाई को सुरक्षित और समादृत करने के लिये चांदी से मढ़ाया जाता है, जिसे बजाने वाले को हेसी कहा जाता है। यही नाटी का प्राण होता है। एक कहावत है, “बाज़ ड़ै ढोलीआ ढीली नाटी जाचा नी वणदी हेसी घटी” अर्थात् “अरे ढोलकिए! ढीली ही (फीकी) नाटी बजा दे, वैसे हेसी के बिना जाच (मेला) किस काम की!” यहां प्रसंगवश एक बात कहना चाहेंगे कि ‘जाच’ शब्द मेला और नाटी दोनों का समान पर्यायवाची है। नाटी आरम्भ करने को ‘जाच पाणी’ और मेले में जाने को ‘जाचा बै जाणा’ कहते हैं।

जाच का प्राण ‛हेसी’ नाटी-क्षेत्रों में बड़ा आदर का पात्र होता है। लोग अपने चतुर कलाकार हेसी पर गर्व करते हैं, इन्हें प्रोत्साहित करते हैं यहां तक कि अपहरण भी करते हैं। ‘हेसी’ पहले जन्म से होते थे परन्तु अब कर्म से होने लगे हैं। हां, किसी स्वर्ण को हेसी का काम करते नहीं देखा। हेसी गीत बजाता है, ढोलकिया ताल पकड़ कर पखावज की भांति दायीं बायीं ओर को बजाकर नेतृत्व करता है। ढोलकी डौंडी या काठी से बजाई जाती है। अंग्रेजी बैंड बाजे की भांति नाटी वाद्यवृंद में भी दायां और बायां के लिये जुदा जुदा साज होते हैं। ढोल (ड्रम) धामा (बायां) का और नगारे दायां साइड ड्रमों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो ढोलकी से निकले बोलों को ऊपर उठाते हैं। बैंड की भांति कुशलता से ये संगतिये तालों को चमकाते हुए बड़ी कलाबाजियों, दुगुण तोड़ आदि बजाते हुए पूरी मात्राओं पर ‘सम’ पर लौट आते हैं। इन के भी तबला आदि की भांति मात्राओं और तालियों-खालियों के बोल होते हैं परन्तु ये मात्र प्रयोग या व्यवहार द्वारा ही प्रचलित हैं। खाली का नृत्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, इन का कोई अभिलेख अभी नहीं मिला। फिर भी एक साथ प्रत्येक साज दसियों की संख्या में बजने पर भी कहीं जानकारों द्वारा गड़बड़ी नहीं होती। अभी हमने एक भांडा या साज का उल्लेख नहीं किया जो नाटी में प्रयोग होता है; यह है करनाल। ये लम्बे लम्बे पीतल या चांदी के भोंपू बज रहे ताल के अनुरूप अनेकों की संख्या में एक स्वर से बज कर नाटी को या नर्तकों को प्रोत्साहित करते हैं। भाणा कांसे की थाली के रूप में झांझ या मंजीरे का काम करता है।

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यहां एक बात विशेषतया उल्लेखनीय है कि इस क्षेत्र में प्रत्येक या कुछेक गांवों का अपना देवता होता है। उसकी पालकी को उठाया और इधर उधर ले जाया तथा नचाया जाता है। इसके लिये उनके पास साजों के सैट होते हैं और उन के बजंतरी या बाज़गी (बजानेवाले) भी, जिन्हें स्थायी वृत्ति उपलब्ध रहती है, बजाने के लिये प्रतिबद्ध रहते हैं। जिन देवताओं का बाजा वैयक्तिक देवेत्तर उपयोग के लिये वर्जित होता है वहां लोग चंदे आदि से बना लेते हैं। किसी क्षेत्र का बाजा-विहीन होना दुर्भाग्य या लज्जा की बात अनुभव की जाती है। वैसे शौकीन लोग दो चार घरों पर एकाध बड़ी ढोलकी रखे रहते हैं। जिसे तीज त्यौहारों की घरेलू महफिलों में स्वयं बजाकर नाचा जाता है।

कम से कम दस साजों का एक वाद्य-वृंद सम्पूर्ण माना जाता है। इस में शहनाई पर गीत बजा, ढोलकिये ने ताल पकड़ा और संगतियों ने उसे उठाया, चमकाया और उधर नर्तकों के पांव आकुल हो उठे-थिरकने के लिये। और लोग घरों से निकल कर गली में बाजे के साथ शामिल हो कर नाटी-स्थान की ओर जिसे ‘सौः’ कहते हैं, नाचते हुए चल पड़ते हैं। वहां स्थायी नाटी का कार्यक्रम हो तो बाजे वाले सौः या खौळ्ह के मध्य बैठ जाते हैं और नर्तक उन के बाहर घेरे में पांत बना कर नाचने लगते हैं। ये नाचने वाले कोई कारोबारी या व्यवसायी नहीं होते। गांवों के शौकीन लोग अपने मनोरंजन के लिये नाचते हैं, अपनी अंटी से पैसे खर्च भी करते हैं और समय भी। नाटी नाचने में वय और वित्त का कोई भेद नहीं होता, भले ही कोई 80 वर्ष का हो या आठ का; अमीर हो या गरीब, सभी कतार में जुड़ कर नाचते हैं। हां, कुल, वय और कला-वृद्धों को भरसक दाहिने स्थान दिया जाता है या फिर वे लोग दाहिने नाचना अपना हक समझते हैं जो परम्परागत एक विशेष नाटी वेष से अलंकृत होते हैं। जिन के घर में यह परिधान पहले से नहीं है, वे शौकीन अपनी पहली बचत में यह चाव पूरा करते हैं। नटैया तभी अपने को मुकम्मिल नटैया समझता है। इसलिये सम्पन्नता के साथ साथ इस परिधान का प्रचार भी बढ़ता ही जा रहा है। पिछड़े माने जाने वाले क्षेत्रों की भी अब नाटी-टोलियां आने लगी हैं।

वैसे नाटी-परिधान सस्ती चीज़ नहीं है। इस में मुख्य तो ‘चोला’ होता है जो महीन ऊन का महीन ही काता, बुना और घाघरे जैसा तिकोन कलियां जोड़ कर सिला हुआ घुटनों तक होता है। इस में बाज़ुदार अंगिया जड़ी रहने से कोट की भांति पहना जाता है। कहीं घाघरे का घेरा बढ़ाने के लिए चोले के नीचे सूती चोली भी पहनी जाती है, चोले पर सफेद तहाई हुई गाची कमर पर लपेटी जाती है। इसके ऊपर बायें कंधे से दाहिनी बगल की ओर बढ़िया चटख रंग का असली या नकली बनारसी दुपट्टा गाची में खोंसा जाता है, उस के दोनों सिरे नीचे तक लटके रहते हैं। यदि ठंडक अधिक हो तो चोले पर लाछ अर्थात् बढ़िया ऊनी पट्टू, फूलदार (शाल), चांदी की जंज़ीरदार बूमणी (कीलों) से सुन्दर ढंग से पहना जाता है। टांगों में हिम-धवल चूड़ीदार पाजामा, जुराब और जूते। यह सब का एक समान रखने का भरसक प्रयत्न रहता है। सिर पर काली ऊन का मोटा बुना टोपा और थैली सा सीकर, थैली के एक छोर पर सिर के आकार का गोलाकार टुकड़ा (खोर) जोड़ कर दूसरे छोर के किनारों को लपेट कर खोर की सिलाई तक पहुंचाया जाता है जो खोर के चौफेर मोटा सा रस्सा बन कर टोपा कहलाता है। टोपे के खोर और फेर के जोड़ पर एक या अधिक कलगियां रहती हैं। इन में मुख्य कलगी तो अवश्य ही मनाल की कलगी से बनी होती है।

ऊंचे हिम-शिखरों पर मनाल नाम का अत्यन्त गाढ़े और चमकीले रंग के पंखों वाला पक्षी होता है, जिस के सिर पर आयु के अनुसार एक से 25-30 तक पंखुड़ियां कलगी स्वरूप लगी होती हैं। इन्हीं को एकत्र करके कम से कम 200 और अधिकतम 350 पंखुड़ियों की एक कलगी बनती है। आजकल 1 रु० प्रति पंखुड़ी साधारण भाव है। किसी खानदानी या सम्पन्न व्यक्ति के पास हुंकार (हुमा) नाम के पक्षी की दुर्लभ कलगियां भी देखी जाती हैं। बढ़ता हुआ नाटी या कलगी का प्रचार मनाल के विनाश का कारण बन रहा है। दूसरी कलगियां मोर आदि की भी हो सकती हैं जो 10-12 रु० में मिल जाती हैं। इन के इलावा टोपे के फेर पर सामने की ओर सोने या चांदी की झालरदार दुतियाएं और पीछे की ओर चाँदी की तुनकी, कानों में बाळे या गोखड़ू, गले में सोने की चौकी भी पुराने लोग पहनते हैं। आज कल कुल मिला कर एक पुरुष परिधान 1000 से कम नहीं बैठता है जब कि महिलाओं का उत्कृष्टतर पट्टू जिसे साड़ी की भांति पहन कर कमर पर गाची बांधी जाती है, ही एक हजार का हो जाता है। इस के इलावा मूल्यवान आभूषण भी हो सकते हैं, जो अनिवार्य नहीं। नर्तक के एक हाथ में सुसज्जित पंखा और बायें हाथ में रंगीन रूमाल रहता है। पंक्ति में नाचते हुए जब बायीं ओर के साथी को पकड़े रहना पड़ता है, तो रूमालों को गाची में खोंस लेते हैं। मुक्त नाचने की स्थिति में पंखे का स्थान तलवारें ले लेती हैं।

भारतीय नृत्यों के दो मुख्य भेद प्रसिद्ध हैं। विलंबित गति वाले ‘लास्य’ और तीव्र या चंचल गति वाले ‘तांडव’। कुल्लू की नाटी की विशेषता उसकी लास्य-बहलता है क्योंकि यहां प्राचीन परम्परानुसार नाटी कभी कभी कई कई अहोरात्र तक चलती है। 12-15 घंटे तो छोटे छोटे आयोजनों और ब्याह शादियों में भी जम जाती है, ऐसा तभी सम्भव होता है जब नाटी अपने असली या मौलिक रूप में नाची जाती है अर्थात् बहुत मंद गति से। यह विलम्बिता का गुण नाटी में ही प्रशंसनीय हो, ऐसा नहीं। स्वयं प्राचार्य भरत मुनि ने लास्य को उत्तम नाच कहा है, वे लिखते हैं:―

धैर्योपपन्ना गतिरुत्तमानां मध्या गतिर्मध्यमसम्मतानाम्।
द्रुता गतिश्च प्रचुराधमानां लयत्रयं सत्त्ववशेन योज्यम्।।

(अध्याय 12, श्लोक 13)

अर्थात अच्छे नर्तकों की चाल धीमी, दरम्याना चाल मध्यमों की, और तीव्र गति निकृष्टतरों (नर्तकों) की होती है। ये तीन प्रकार की लये इन के लक्षण माने गये हैं।

यद्यपि नाटी माला में अधिकांश नाटियां त्वरा गति वाली भी हैं परन्तु इन्हें तब नाचा जाता है, जब नाच का अवसान करना हो क्योंकि उछल कूद में आनन्द या विश्रांति के बजाय थकावट हो कर बस हो जाती है। अतः इन तालों को समारोह के अन्त में या राह चलते नाचा जाता है।

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लम्बे आयोजनों में बीच में बैठे बाज़गियों के पास (ठंड हो तो) आग का अलाव और हुक्का (नरेल) पीने का भी जुगाड़ रहता है। एक आदमी नटैयों की कतार के साथ चलता हुआ सब को तम्बाकू के घूंट पिलाता चलता है और बीच बीच में अपना कमीशन (हुक्के के घूंट) भी वसूल करता रहता है। इस तम्बाकू-प्रक्रिया का नाटी की गति-यति पर कोई अवरोध नहीं पड़ता। वह नाटी का रस भी लेता रहता है। द्रुतगति या तांडव ढंग की नाटियों में ऐसे संभव नहीं हो सकता। लम्बे कार्यक्रमों में तो धीर-गति नाटियां 90 प्रतिशत समय लेती ही हैं छोटे कार्यक्रमों में भी इन्हें अन्त का एक चौथाई समय ही मिलता है जिस में लाहुली, चम्बियाली, चाखली, उजगजमा, खड़ायत आदि उछल-कूद की होती है। इन के बाद बांठड़ा, लूडी आदि की लास्यता से विश्रांति पाते हैं परन्तु अन्ततः वे भी चंचल हो जाती हैं। आज के युग में जो नाटी के अस्थायी या अनभिज्ञ दर्शकों के मनोरंजन के लिए रूप प्रदर्शित किये जाते हैं वहां ये व्यावसायिक रूप ले लेते हैं।

एक पग (यह पग विलम्बित नाटियों में एक दो इंच से अधिक नहीं होता) दाहिने बढ़ा (ताली एक), दायां पीछेवाला पांव दाहिने सरकाया (ताली दो), फिर यही क्रम दुहराया (ताली चार), बाम पादक का वहीं ठुमका दिया (ताली पांच), बायां पांव पीछे किया (ताली छः), दायें पैर का आगे ठुमका (ताली सात), दायां पांव पीछे अपने स्थान पर रखा (ताली आठ), इस प्रकार के चक्रों से आगे बढ़ते बढ़ते सैकड़ों, सहस्रों चक्रों के अनगिनत फेरे नर्तकों की पंक्ति बजंतरियों के समताल लगाती चलती है। तबले के तालों की भांति नाटी तालों के भी अनेक विभिन्न ताल भिन्न भिन्न संख्या की मात्राओं में होते हैं परन्तु पाद, प्रक्षेप, अंग चेष्टाएं तालियों पर ही होती हैं जो भिन्न भिन्न नाटियों की भिन्न भिन्न संख्या की मात्राओं पर होती हैं। ये ताल छः, आठ, दस, बारह, चौदह, सोलह और चौबीस मात्राओं के पाये जाते हैं। ताल कितनी मात्रा का भी हो नाटी का चक्र (लूडी, तरासे छोड़कर) आठ ही तालियों का चलता रहेगा, ताल के सम पर लौटने का प्रभाव तोड़ के अवसर के अतिरिक्त परिलक्षित नहीं होता, इस प्रकार नाटी का भरपूर आनन्द नाचने देखने के इलावा बजाने वाले भी लेते हैं।

नाटी का आयोजन जितना लम्बा हो उसी के अनुसार ये नाटियां बदली जाती हैं। उसी अनुपात से प्रत्येक नाटी को समय देकर अगली का प्रारम्भ होता है। नाटी संचालन वैसे तो हेसी करता है परन्तु कई बार उसे नाटी को बदलने में कठिनाई का सामना करना पड़ता है। जब ढोली लोग एक नाटी को तन्मयता से बजाते हए आसमान सिर पर उठाये रहते हैं तो उस नक्कारखाने में बेचारी तूती की कौन भने। ऐसी दशा में कोई समर्थ ढोली ही बदलाव दे सकता है।

ये पुरानी मूल नाटियां भीतरी सराज में तो आम और कुल्लू तहसील के जगतसुख, नगर, मणिकर्ण, पूईद और जलूग्रां आदि के मुख्य मेलों में भी होती हैं। ऐसे लम्बे आयोजनों में जब नाटी स्थानान्तरित भी करनी हो तो भी विलम्बित ही नाचती हुई मेल दूसरे स्थान तक जाती है। उन नाटियों में खुले नाचने में रस नहीं माना जाता। जब हेसी नाटी बदलने के लिये आलाप छेड़ता है तो नाचने वाले उत्सुकता से आऽऽ का स्वर करके उसका समर्थन करते हैं और हेसी या कोई नटैया ही अपनी पसन्द का उसी या अन्य ताल का गीत छेड़ देता है। यदि तालांतर हुआ तो गति, यति और अंग चेष्टाओं में भी बदलाव आता है। इस प्रकार नाटी का सोपान धीर या विलम्बित की ओर से चढ़ते चढ़ते क्रमशः त्वरा की ओर बढ़ता है। ये सीढ़ियां विभिन्न नाटियां ही हैं।

चलन्त नाटियों में खुला नाचने को भी पसन्द किया जाता है जिसमें दाहिने हाथ के पंखे का स्थान खड़ग (तलवार) ले लेती है इस से तांडवता और बढ़ जाती है। हां, मेल में तलवार का मेल नहीं बैठता। मुक्त नर्तक ही त्वरित नाटियों में तलवारें घुमा कर नाचते और दो तलवारिये परस्पर खड़ायत बाजा बजने पर घोर युद्ध का जैसा दृश्य भी प्रस्तुत करते हैं जो दो तीन मिनट से अधिक नहीं चलता। यह दृश्य एक से अधिक जोड़ियां भी कर सकती हैं। इस दौरान बाकी नर्तक रूमाल घुमा घुमा कर ‘शाबशे’ ‘शाबशे’ करते रहते हैं। पुनः वही या कोई दूसरी चलन्त नाटी अथवा तरासे आदि शुरू हो जाते हैं। कहते हैं इस खड़ायत नामक नाच का चलन कुल्लू के योद्धा राजा मान सिंह ने अपने सैनिकों को चुस्त नाच नाचने के लिये जारी किया था। इस प्रकार तीव्रतर नाटियों में पंक्ति में नाचने वालों की गति और अंग चेष्टाएं भी त्वरित हो उठती हैं, क्योंकि ताल ही ऐसे होते हैं। वे गंभीर नर्तक ऐसे अवसर पर मैदान छोड़ बैठते हैं।

वर्तमान नाटी का रूप बहुत बदल गया है। इस में बहुत से आकर्षण नये जुड़ गये हैं। प्रदर्शनों और प्रतियोगिताओं में प्रस्तुत की जाने वाली नाटियों को कट्टरपंथी भले ही कोसें परन्तु इस में बुराई क्या है? यह कला है इसका आदान-प्रदान होना भी बुरा नहीं। पहिले भी हमारी नाटी में चम्बयाली, बसाहरी, लाहुली आदि आयातित नाटियां हैं। अब भी गणतंत्र दिवस पर दिल्ली के प्रदर्शनों से देश के दूसरे भागों के नृत्यों को आयातित करने लगे हैं जब कि आज देश के दूसरे भागों में भी नाटी के परिधान, तालों और नृत्यों की नकल दूर दूर तक फैल गयी है। यह ठीक है कि परम्परागत नटये इन प्रतिस्पर्धाओं में उन्नीस उतरते हैं जब कि तत्काल जन्मी हुई टोलियां कुछ दिनों की तैयारी प्रशिक्षण और अभ्यास के बूते पर इक्कीस उतरने लगी हैं। इन प्रतियोगियों की वरीयता, मौलिकता आदि के आधार पर न दी जा कर, नर्तकों के रूप-सज्जा, एकरूपता आदि आर्कषणों को दृष्टिगत रखने से ही ऐसा होता है।

इस उन्नीस-इक्कीस का एक और बड़ा कारण यह भी है कि जब नाच नाचने वालों की मन मौज की सीमा से निकलकर दर्शकों के मनोविनोद की वस्तु बन जाता है, तो उन की मन-पसन्द को ध्यान में रख कर इसे अधिकाधिक आकर्षक बनाने के लिये अन्य उपाय किये जाते हैं। इस दिशा में सब से बड़ा पग है, नाटी में महिलाओं का समावेश। यह एक, एकदम नया प्रयास है, स्वतन्त्रता काल की देन। अब यह आकर्षण नाटी में सर्वोपरि स्थान पा गया है, किशोरियों से ले कर प्रौढ़ाएं तक इस में भाग लेने की ललक रखने लगी हैं और नाटी का प्रभाव भी तभी से अधिकाधिक व्याप्त होता जा रहा है। निस्सन्देह तब नाटी अत्यन्त आकर्षक बन जाती है जब पुरुष और महिलाएं अपने अपने परिधानों में सज-संवर कर मंच पर उतरते हैं। हां, लालित्य और कला तो क्षणिक अभ्यास द्वारा आने से रही, परन्तु तब भी टोली अंक सजाने में सफल रहती है।

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इस दिशा में एक तथ्य नकारा नहीं जा सकता कि कुल्लू की महिला मंच पर तो क्या, कमरे के बाहर भी कहीं नहीं नाचती। देवता सम्बधी आयोजनों में नाचे भी तो वह भी पुरुषों से पृथक। इसी लिए जो लोग इन मर्यादाओं के घेरे तोड़ कर निःशंक मंच या मैदान में कूदते हैं, वे इक्कीस उतरते हैं। प्रतिस्पर्धाओं में हार-जीत के प्रश्न से ऊपर उठ कर यदि सोचा जाय तो दोनों अपनी अपनी जगह पर ठीक हैं, न तो परम्परावादियों को गलत कहा जा सकता है, जो इस सांस्कृतिक धरोहर को अपने विनोद के लिये लोक नाच के रूप में लेते हैं; न ही नाटी को नया मोड़ देने वालों को, जो अपने इस नाच को अधिकाधिक आकर्षक बना कर इसे समयानुकूल रूप देने का प्रयास कर रहे हैं। संक्षेप में इसे शास्त्रीय संगीत और फिल्म-संगीत की चर्चा जैसा विषय माना जा सकता है।

नाटी दीर्घ काल तक बाहर वालों से उपेक्षित रह कर उस क्षेत्र के हिमाचल में मिल जाने के बाद समादृत होने लगी है। आशा है, भविष्य में यह सब के मनोरंजन का साधन सिद्ध होगी।

– ‘आलोक’, ढालपुर कुल्लू, जिला कुल्लू

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