कुल्वी रीति-रिवाज़ (1910)

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20वीं सदी के शुरुआती दशक में कुल्लू घाटी के लोगों के व्यवहार और रीति-रिवाज पर एक टिप्पणी।

(1910 में ‛मॉडर्न रिव्यु’ नामक जर्नल में छपे गणितज्ञ होमर्शम कॉक्स के एक अंग्रेजी आलेख से अनुवादित)


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खान-पान

खाना और पानी मानव जीवन की प्राथमिक जरूरतें हैं, वास्तव में सभी जीवों की; और इसलिए किसी भी जाति के रीति-रिवाजों का वर्णन करते हुए यह स्वाभाविक है कि शुरुआत उनके खान-पान से हो।

कुल्वी किसान एक दिन में चार भोजन लेता है; नोहारी, कलारी, दपोहरी, और ब्याली। ये प्रायः आंग्ल-भारतीयों के छोटा हाज़री, नाश्ता, टिफिन और डिन्नर के साथ मेल खाते हैं; और दोनों ही मामलों में दूसरा और चौथा सबसे महत्वपूर्ण है, जबकि पहला और तीसरा हल्के आहार हैं। नोहारी पिछली रात का बचा हुआ खाना होता है और किसान घर से अपने खेतों में काम पर जाने से पहले यही खाता है। यदि उसे ज्यादा दूर नहीं जाना है तो वह नौ या दस बजे नाश्ते के लिए घर लौटता है, लेकिन आम तौर पर मजदूरों के लिए भोजन घर की महिलाओं द्वारा ही पका कर लाया जाता है। दपोहरी तीन बजे ली जाती है, जो अगर घर पास न हो तो कलारी की तरह ही होती है और खेत में ही एक पेड़ की छाँव के नीचे खायी जाती है। दिन का काम खत्म होने के बाद आखिरी भोजन ब्याली घर पर किया जाता है। भोजन में मुख्य रूप से रोटी या चावल होते हैं, लेकिन जैसा कि ये अपने आप में कुछ फीके हैं, इन्हें ‘च़ोकण’ से एक विशिष्ट स्वाद दिया जाता है। आमतौर पर च़ोकण कोई हरी सब्जी, या दाल, या दही होता है; और कदाचित दुर्लभतया मांस।

किसान अपनी जमीन से ही खुद के लिए भोजन उत्पादित करता है और अपने मजदूरों को भी यही भोजन देता है; चावल, अगर वह चावल के खेतों का मालिक है, और यदि नहीं, तो रोटी। चूंकि कुल्लू घाटी संकरी है, नदी के पास की भूमि, या रोपा, जिस पर चावल उगाया जाता है, कम है। अधिकांश खेती की गई भूमि ‘बातळ’ है, और गेहूं या जौ या मक्का पैदा करती है, इसलिए पहाड़ियों पर रहने वाले ग्रामीणों के लिए चावल एक लक्जरी है। भोजन के अलावा, मजदूरों को वेतन के रूप में किसान से अनाज ही मिलता है, क्योंकि घाटी में बहुत कम नकदी संचलन में है। खाने के समय पानी पिया जाता है; उत्सव के दिनों को छोड़कर जब चावल से बनी ‘लुगड़ी’ नामक शराब मुहैया होती है। चाय जो पड़ोसी कांगड़ा घाटी में बहुत आम हो गई है, शायद ही कभी कुल्लू में ली जाती हो। स्ट्रैबो के अनुसार:

[भारतीयों का] पेय जौ के बजाय चावल से बनाया जाता है, और उनके भोजन में अधिकांशतः चावल का शोरबा शामिल है।

वर्तमान समय में कुल्लू के लिए पहला कथन सही बैठता है, लेकिन दूसरा केवल ब्यास नदी से लगते निचले इलाकों के जमीनदारों पर लागू होता है, पहाड़ की ओर रहने वालों के लिए नहीं।

पहनावा

आज भी किसान और उसके परिवार के कपड़े आम तौर पर खुद ही बुने जाते हैं। वह एक गोल ऊनी टोपी पहनता है, जिसके लिए ऊन उसे अपनी पालतू भेड़ों से मिलती है या फिर लाहौलियों से खरीद कर; च़ोळू नाम का बिना बटन का कोट, जो किसी सामान्य कोट से मुख्यता इस प्रकार भिन्न है कि इसका कपड़ा एक साथ बीस या ज्यादा लम्बी पट्टियों को सी कर बनता है; और पतलून जिसे सुथणी कहते हैं। इन तीन चीजों से एक आम किसान संतुष्ट हो जाता है, और चूंकि च़ोळू और सुथणी टोपी की ही तरह अक्सर खुद की भेड़ों की ऊन से बनते हैं, उसे कपड़ों पर कुछ भी खर्च करने की जरूरत नहीं पड़ती। जो समृद्ध हैं वे कुर्ता पहनते हैं और कभी-कभी इसके अलावा एक वास्कट भी। गर्मियों में सुथणी की जगह केवल घुटनों तक पहुंचने वाली निकर जिसे काछ़ कहते हैं पहनी जाती है, लेकिन मेलों के लिए सुथणी अनिवार्य है। हालांकि पुराना कुल्वी पहनावा अब चलन से बाहर हो रहा है। टोपी और च़ोळू की जगह अब अक्सर पगड़ी और साधारण कोट ने ले ली है।

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महिलाओं के सिर की पोशाक ‛थिपू’ केवल एक चौकोर रूमाल है, जिसे माथे और कनपटी को ढंक सिर के पीछे एक गाँठ मार कर पहना जाता है। चूंकि यह ‛दुपट्टे’ की तरह खुला नहीं रहता, इससे चेहरा नहीं ढक सकते। लेकिन कुल्वी महिलाओं को अपना चेहरा न छुपाने से कोई गुरेज़ नहीं, यहां तक कि जब वे दुपट्टा पहने भी, जो कि उनमें से कुछ अब पहनने लगी हैं। विभिन्न देशों में शालीनता के विचार अलग-अलग होते हैं। मुझे याद है, जब एक कांगड़ी महिला हमारे सामने से गुजरी तो उसने अपना चेहरा ढंक लिया, जो मेरे एक कुल्वी मित्र के लिए बेहद मज़ेदार बात थी। यह उसे और अधिक हास्यास्पद लग रहा था क्योंकि महिला एक ऐसी उम्र में पहुंच चुकी थी, जहां उसके पास पुरुषों की अति उत्साही नज़रों से डरने का कोई कारण नहीं था। वहीं दूसरी तरफ, केवल कुर्ता और पायजामा पहनना, जैसा कि मैदानों में महिलाएं अक्सर करती हैं, कुल्लू के लोगों को अभद्र लगता है। कुर्ता और पायजामा के ऊपर कुल्वी महिलाएं एक ‛पट्टू’, यानी एक तरह का कंबल, से पूरे शरीर को ढंक देती हैं। यह गर्मियों में भले ही बहुत गरम लगे लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि इससे उन्हें कोई आपत्ति नहीं।

वास्तव में एक अंग्रेज के लिए यह बेहद विचित्र बात है कि पहाड़ियों में पुरुष और महिलाएं दोनों गर्मियों में अपेक्षाकृत भारी कपड़े और सर्दियों में अपेक्षाकृत कम कपड़े पहनते हैं। अपने इलाके में वे गर्मी और ठंड दोनों के प्रति कम संवेदनशील प्रतीत होते हैं। लेकिन जलवायु परिवर्तन को वे सहन नहीं करते, जैसे सिराज के लोग गर्मियों के दौरान राजधानी सुल्तानपुर में रहने से इनकार करते हैं। ग़रीब ग्रामीण महिलाएँ थिपू और पट्टू के अलावा कुछ और नहीं पहनती। पहले अविवाहित लड़कियों का नंगे सिर रहने की प्रथा थी, लेकिन अब इस का उतना पालन नहीं होता। कुल्वी पोशाक में देखा जाए तो कम से कम एक योग्यता तो है, कि दोनों पुरुष और महिलाएं झुंझलाहट के सतत स्रोत ‛बटन और स्टड’ से मुक्त हैं।

मकान

मकान बनाने के लिए पत्थरों की चिनाई की जाती है जिनमें नियमित अंतराल पर केळू (देवदार) लकड़ी के शहतीर लगाए जाते हैं। दीवार में लंबाई और आड़े में पीछे से आगे लगे शहतीर या ‛चेउळ’ लोहे या लकड़ी के पेंच से जोड़े जाते हैं। इस तरह पूरी दीवार ऐसे बंधी रहती है मानो एक ही शीलाखण्ड हो और एक तेज़ भूकंप को झेल सकती है। कमोबेश इसी कारण भवन-निर्माण की यह विधि पहले-पहल अपनाई गई होगी, जिसके फायदे मंडी राज्य के झटिंगरी से गुजरने वाले यात्री स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। जहां झटिंगरी डाक बंगला 1905 के भूकंप में ताश के पत्तों की तरह गिर गया था, पारंपरिक शैली में बनी सराय अभी भी ज्यों की त्यों खड़ी है।

Chhet Village, Banjar 1866. From a photograph of Samuel Bourne.

आमतौर पर घरों की बाहर से लिपाई-पुताई की जाती है। अधिकांश मकान केवल एक मंजिला हैं, लेकिन धनी ग्रामीणों के मकान दो मंजिला हैं जिनके बरामदों पर सुंदर नक्काशीदार लकड़ी का काम किया गया है। ऐसे किसी उत्कृष्ट भवन में लगभग छह कमरे, तीन ऊपर और तीन नीचे, हो सकते हैं; सभी बहुत छोटे ताकि सर्दियों में गर्माहट बनी रहे। कुलू में किसान का ताज़ी हवा के गुणों में विश्वास दूसरी जगहों से बिल्कुल भी ऊपर नहीं। कस्बे के कुछ पंजाबी व्यापारियों ने अपने घरों में चिमनी लगाई हुई है, लेकिन किसी भी कुल्वी किसान ने उनका अनुसरण नहीं किया है। कुल्वी किसान अतिरिक्त खर्च वहन कर सकता है फिर भी आधुनिकता से गुरेज नहीं रखता, यह कुछ निराशाजनक है। आग कमरे के बीचोंबीच जलाई जाती है और धुआं छत में की गई थोड़ी सी खाली जगह से होकर बाहर निकलता है। सर्दियों की लंबी शामों में परिवार और मेहमान जलती हुई लकड़ियों के चारों ओर बैठते हैं, कहानियां सुनाते हैं और ऊन कातते हैं। यथाविधि, सिवाय आग के रोशनी का दूसरा कोई साधन नहीं होता, और न ही उन्हें ज़रूरत पड़ती है क्योंकि कोई भी पढ़ता या लिखता नहीं। विशेष अवसरों पर गृह-देव के सामने दीपक जलाया जाता है, जिसमें केरोसीन, जोकि भारत में अब बहुत आम है, की जगह कोई भी शुद्ध वनस्पति तेल प्रयुक्त होता है। घरों की छतें ढलानदार हैं और कुलू में स्लेट की हैं, लेकिन मण्डी में सामान्यतः छप्पर की।

जन्म, बचपन और शिक्षा

रोटी, कपड़ा और मकान, वो चीजें हैं जो हमें हर दिन चिंतित करती हैं। लेकिन मानव जीवन के प्रत्येक चरण के साथ कुछ प्रथाएं भी जुड़ी होती हैं, जिनका वर्णन मैं यहां जन्म से मृत्यु के क्रम में करूँगा।

कुल्वी बच्चा आमतौर पर आश्चर्यजनक सुगमता से दुनिया में प्रवेश करता है। पिछले साल के एक मामले में, प्रसव काल का कुल समय ही दो घंटे से अधिक न था। प्रसूता, जिसने खुद ही वो सब कुछ किया जो आमतौर पर एक डॉक्टर या दाई करती है, अगले दिन उठ भी गई। हालांकि, रिवाज अनुसार उसे कुछ दिनों तक कमरे में ही रहना पड़ता है: पाँच या सात दिन यदि लड़की हुई हो और पंद्रह दिन यदि लड़का। इस दौरान वो केवल घी मिश्रित दलिया खाती है, और अपवित्र मानी जाती है। पंद्रहवें दिन बच्चे को सूरज दिखलाने बाहर लाया जाता है। एक धनुष और बाण उसके हाथों में रखते हैं जो उसके बड़ा होने पर उपयोग के लिए संभाल कर रखा जाता है। इस शांतिपूर्ण समय में निश्चित ही इसका एक खिलौने के अलावा कोई दूसरा उपयोग नहीं। घी से तर एक बड़ा मीठा रोट बच्चे के नाम पर मित्रों और मेहमानों में बांटा जाता है। प्रसूता की शुद्धि के लिए एक पत्थर पर किशमिश, जौ, कायल और भेखळ लकड़ी का मिश्रण जलाया जाता है। इस समय तक घर के सभी सदस्यों को अपनी जाति के साथियों से अलग रहना होता है। बच्चा अपनी मां का दूध अक्सर दूसरा बच्चा होने तक पीता है। शेतू का लड़का, जो पांच वर्ष पहले आए भूकंप वाले साल (1905) पैदा हुआ था, अभी तक दुधमुंहा है। जब बच्चे से दूध छुड़वाना आवश्यक हो जाए, तो ‛डोडणी’ पेड़ की छाल का चूर्ण, जिसका स्वाद कड़वा होता है, स्तन पर लगा देते हैं।

बच्चे का नामकरण अक्सर कुछ समय तक टाला जाता है। एक साल पहले पैदा हुए रिड़कू के बेटे का नाम अभी तक नहीं रखा गया है। कुछ नाम उस महीने पर रखे जाते हैं जिसमें बच्चा पैदा हुआ था, जैसे बसंती, फागणी, माघणू, पोशू; और कुछ व्यक्तिगत विशिष्टता के कारण, जैसे ‛शेतू’ अर्थात गोरा। उसे यह नाम अपने सुंदर बाल और नीली आँखों के कारण मिला है। वहीं ‛बेचारा’ या दुर्भाग्यपूर्ण, एक बहुत ही अनुचित नाम लगता है इसके मालिक के लिए, जो एक चार साल का छोटा लड़का है, अपने आप में बेहद खुश और हंसमुख। जब वह छोटा था तो हमेशा बीमार रहता, और तब जाकर ठीक हुआ था जब उसे एक खड़ी ढलान से निकले ‛फागड़ा’ (जंगली अंजीर) पेड़ की जड़ के नीचे से गुज़ारा गया। तब से वह सबल और स्वस्थ है। अभी तक जितना मैंने जाना है, बच्चे के नामकरण के लिए कोई विशेष अनुष्ठान नहीं होता और न ही कोई ग्रंथ देखा जाता है। पुरुष नाम सामान्यतः ‛ऊ’ में और स्त्री नाम ‛ई’ में समाप्त होते हैं, माघणू हालांकि एक महिला का नाम है।

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कुल्लू में बच्चों द्वारा खेले जाने वाले एक खेल को साग-समुंदर कहते हैं, जो अंग्रेजी हॉप-स्कॉच खेल से मिलता-जुलता है। एक आयत को नौ कक्षों क्रमशः साग या समुंदर, भाऊ, धोबी, बिल्ली, ब्राघ, कुत्ता, गीदड़, आंदर और बाहर में बांटा जाता है। इनमें ‛बिल्ली’ दूसरों की तुलना में बहुत संकरा कक्ष होता है। ‛बिल्ली’ के एक ओर लगभग अर्धवृत्ताकार कक्ष होता है जिसे ‛कुआ’ कहते हैं। लड़का एक पैर ‛आंदर’ और दूसरा ‛बाहर’ में रख कर एक सपाट पत्थर को ‛साग’ में फेंकने की कोशिश करता है। यदि वह सफल हो जाता है तो उसे एक पैर पर उछलते हुए पत्थर को एक कक्ष से दूसरे कक्ष में (बिल्ली छोड़ कर) अपने पैर से मारते हुए लाना होता है। पत्थर ‛बिल्ली’ में या किसी रेखा पर नहीं रुकना चाहिए, और न ही आयत से बाहर जाना चाहिए। ‛आंदर’ और ‛बाहर’ को छोड़ अन्य सभी कक्षों को इसी तरह निपटाया जाता है, इन दो कक्षों में लड़के को एक पैर पर उछलने की बजाय दोनों पैरों को एक साथ बंद कर कूदना होता है। सबसे आखिर में वो पत्थर को ‛कुआ’ में फेंकता है और ‛बिल्ली’ होकर बाहर लाता है। यही खेल पंजाब में भी खेला जाता है, लेकिन कक्षों को अलग नाम देकर। बच्चों के अन्य खेल हैं: ‛गोझ़-मोझ़’ या लुका-छिपी और ‛ओरे-पोरे’ या विषम-सम। आखिरी वाले में यह अनुमान लगाना होता है कि हाथ में रखे ‛शाढ़े’ (जंगली खुबानी) की संख्या सम है या विषम।

Children playing Saz Long, the Kashmiri version of hopscotch. (ca. 1900, Kashmir) [Source]

छोटा बच्चा बहुत जल्द घर के कामों में सहायता करना सीख जाता है: जैसे मवेशियों की देखभाल करना या पानी लाना। जब वो इन कार्यों में व्यस्त नहीं होता तो वह खेल सकता है, क्योंकि शायद ही कभी उसे स्कूल भेजा जाता हो। कुलू में कुछ स्कूल हैं और एक में भी अंग्रेजी नहीं पढ़ायी जाती। उनमें दी गई शिक्षा, जो शुरू से ही एक विदेशी भाषा में संचालित है, उन लड़कों के लिए अनुकूल है जो बाद में सरकारी कार्यालयों में अधीनस्थ लिपिक के पद पर नियुक्त होना चाहते हैं, लेकिन उन किसानों के बेटों के लिए व्यर्थ है जो अपने पिता के ही व्यवसाय को अपनाने का इरादा रखते हैं।

विवाह-संस्कार

यहां विवाह मैदानी इलाकों की तरह जल्दी नहीं होता। रिड़कू की बेटी किशी चौदह की थी जब पिछली जनवरी उसका ब्याह हुआ, हालांकि वो अपनी उम्र से बहुत छोटी लग रही थी। लड़के के पिता के लिए पहल करना [यहां] सामान्य बात है। अगर उसे लड़की के पिता से सहमति मिल जाती है तो समारोह का उपयुक्त दिन चुनने के लिए किसी ब्राह्मण से परामर्श लिया जाता है। इसके अलावा पूरे ब्याह में ब्राह्मणों का कोई काम नहीं होता। ‛उत्तर-पश्चिमी प्रान्त और अवध की जाति प्रणाली’ पर अपनी पुस्तक में मि० नेसफील्ड कहते हैं:

यह एक बर्बर जनजाति के ब्राह्मणीकृत होने के शुरुआती लक्षणों में से है कि उन्होंने एक ज्योतिष से परामर्श करना शुरू कर दिया है।

कुल्वी लोगों को किसी भी तरह से बर्बर नहीं माना जा सकता। हालांकि उन्होंने भी अब ब्राह्मण ज्योतिषि की सलाह लेनी शुरू कर दी है, फिर भी दूसरे मामलों में वे ब्राह्मणवाद के प्रभाव में नहीं आए हैं। अभी उन्होंने केवल शुरुआत की है, क्योंकि ज्यादातर गृह देवता से ही परामर्श करते हैं, ब्राह्मण से नहीं। रिड़कू ने यहां दोनों से ही परामर्श लेना उचित समझा। लेखक [नेसफील्ड] के एक धूसर व्यापारी मित्र के अनुसार, जो पंजाब से आकर सुल्तानपुर में बसा है, ब्राह्मण द्वारा यहां विवाह संस्कार नहीं किया जाता क्योंकि ग्रामीण निम्न ‛कोली’ जाति के हैं। यह तर्क सही नहीं है और इसकी पुष्टि इस तथ्य से हो जाती है कि अलाहाबाद में एक चमार भी अपने विवाह के लिए ब्राह्मणों की सेवा ले सकता है, हालांकि ब्राह्मण सबसे अच्छे निस्संदेह न हों।

विवाह समारोह चार या पांच दिनों तक चलता है। पहले दिन दूल्हा और दुल्हन के माता-पिता अपने-अपने घरों में मित्रों व संबंधियों का आदर-सत्कार करते हैं। दुल्हन को दिन में तीन बार स्नान करना पड़ता है। दूसरे दिन दूल्हा अपने मित्रों के साथ दुल्हन के घर जाता है। वह घर में प्रवेश करता है और दुल्हन को, जो अपनी माँ की गोद में बैठी होती है, बाहर ले आता है। दुल्हन को [गोद से] उठाने से पहले उसे माँ को एक रुपया देना होता है जोकि उसके दूध का भुगतान माना जाता है। जब दूल्हा और दुल्हन घर के बाहर परिसर में होते हैं, तो उनके माथे पर लाल टीका लगा कर उन्हें देवी-देवता के रूप में पूजा जाता है। इसे ‛परोह्णा’ कहते हैं। इसके बाद वे दूल्हे के घर जाते हैं। दूल्हा पैदल या घोड़े पर सवार हो सकता है, लेकिन दुल्हन को उसके संबंधियों में से एक की पीठ पर ले जाना होता है। वह घर में एक रात रुकती है और अगले दिन, तीसरे, उसका पिता अपने मित्रों के साथ वहां आता है। दूल्हे के पिता द्वारा उन्हें दावत दी जाती है और वे उसी दिन वापस चले जाते हैं। चौथे दिन लड़की खुद अपने पति और उसके मित्रों के साथ [मायके] लौटती है। वहां पर उनका आदर-सत्कार होता है, जिसके बाद लड़की को छोड़ बाकी लोग वापस चले आते हैं, लड़की अपने पिता के पास एक या दो साल और रहती है। कुलू और भारत के अन्य हिस्सों में माने जाने वाले विवाह के हिन्दू रिवाज में शामिल है: लड़के और लड़की की कलाई में एक धागा बांधना, पवित्र अग्नि की सात बार परिक्रमा करना, दूल्हे द्वारा एक तलवार धारण करना।

जब दुल्हन एक विधवा हो तो कोई विस्तृत समारोह नहीं होता। दोनों पक्षों के बीच एक मुहर लगी सहमति लिखी जाती है और मित्रों को दावत दी जाती है। यदा-कदा एक पत्नी को ऐसे पुरुष से प्रेम हो जाता है जो उसका पति नहीं होता। दुनिया के अधिकांश हिस्सों में यह गुस्से को जन्म दे सकता है, यहां तक कि रक्तपात भी हो जाता है। लेकिन, कूलू में यह मसला प्रायः शांतिपूर्ण रूप से निपटाया जाता है। पति कुछ मुआवजा लेकर पत्नी को उसके द्वारा चुने व्यक्ति के साथ रहने की लिखित सहमति दे देता है। मुआवज़े की राशि कितनी हो इस पर कभी-कभी मतभेद हो सकता है। कुछ दस साल पहले पोशू अपनी जाया को चालीस रुपये में बेचने जा रहा था, लेकिन उसके मित्र रिड़कू ने उससे कहा, “तुम्हारी पत्नी की कीमत चालीस रुपये से कहीं ज्यादा है; तुम्हें उसके कम से कम अस्सी तो मिलने ही चाहिए।” कुछ मोल-भाव के बाद पोशू को अस्सी रुपये मिल गए और वो अपने सौभाग्य पर इतना खुश हुआ कि उसने रात अपने दोस्तों के साथ गाकर और ‛लुगड़ी’ पीकर गुज़ारी। जितना मैं जान पाया हूँ, अस्सी रुपये एक पत्नी के लिए उचित औसत मूल्य है। नाकटू ने अपनी जाया के सिर्फ चालीस दिए थे, मगर ऐसा इसलिए क्योंकि उस पर किसी भूत का साया है।

यदि पति अड़ियल है, तो प्रेमी पड़ोसी राज्य मण्डी की ओर भाग सकते हैं। जैसा कि एक कुल्वी गीत कहता है:

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मुं जाणा मण्डी बे
फिरंगी की सेलरा* लाणा?

मैं मण्डी को जाऊंगी;
फिरंगी क्या कर लेगा?

(*सेलरा: गोंद)

कई बार दो जन ब्याह या लिखित समझौते के बिना भी एक साथ रहते हैं। और न ही इस वजह उन पर कोई लांछन लगाई जाती है, हालांकि कुलू में वेश्यावृत्ति को उतना ही शर्मनाक माना जाता है जितना कि अन्य जगहों पर। कुछ रीतियों का अभाव यहां महत्व नहीं रखता जब पुरुष और महिला परस्पर प्रेम और निष्ठा के साथ रह रहे हों। रिड़कू और माघणू बिना ब्याह के बीस साल तक साथ रहे हैं, और अपने पड़ोसियों और सहजात्यों के बीच किसी भी लिहाज से कम सम्मानित नहीं।

एकमात्र कठिनाई तब होती है जब लड़की का पिता जीवित हो, क्योंकि वो अपनी बेटी के घर भोजन नहीं कर सकता। इसी कारण भोलू और उसकी जाया ने फैसला लिया था कि जैसे ही उनके पास पर्याप्त धन और लुगड़ी जमा हो जाता है वो ब्याह कर लेंगे। मगर, इससे पहले ही उस अभागिन लड़की की प्रसवोत्तर ज्वर से मृत्यु हो गयी। यह बहुत ही दुखद घटना थी क्योंकि उसकी जान शायद बच जाती अगर एक कुशल दाई उसकी देखभाल कर रही होती।

कुलू में, मैदानी इलाकों के विपरीत, किसी लड़की का ब्याह किशोरावस्था से पहले हो जाना आवश्यक नहीं। यह भी संभव है कि उसने होने वाले पति को एक बच्चा भी दे दिया हो। लेकिन तब उसे अपने पिता के घर से सीधे उस आदमी के पास ही जाना चाहिए। एक जाया या विधवा को किसी अन्य पुरुष के साथ यथारीति विवाह (ब्याह) करने की अनुमति नहीं है।

व्यवसाय

ज्यादातर कुल्वी वयस्कों का मुख्य व्यवसाय कृषि है। सामान्यतः जिस भूमि पर वो खेती करता है उसका वो मालिक भी होता है। डॉ० रिह्स डेविड्स ने बुद्ध के समय में भारत के संदर्भ में जो कहा है, वो आज के कुलू पर ठीक बैठता है:

[यहाँ के] निवासियों में ऐसा कोई भी नहीं रहा होगा, जिसे आज अमीर कहा जाता है। लेकिन दूसरी ओर अपनी साधारण जरूरतों को पूरा करने की उनमें एक समर्थता थी, सुरक्षा थी, और स्वतंत्रता थी। तब न ज़मींदार थे, न ही कोई अधीन। अपराध था भी तो बहुत कम।

हालांकि यहाँ हमे “न जमींदार” को “कुछ जमींदार” से बदलना पड़ेगा। कुछ जमीन यूरोप के मेटायेर (metayer) जैसी व्यवस्था के अधीन है, जिसे यहाँ ‛घाड़’ कहते हैं। इस व्यवस्था में फसल के बाद अनाज जमींदार और जोतदार दोनों में बराबर बंटता है। खेती-बाड़ी का ज्यादातर काम किसान और उसका परिवार ही करता है। कभी-कभी, जब खेत सामान्य से बड़ा हो, तो फसल के समय उन्हें बाहरी मजदूरों की सहायता लेनी पड़ती है। मगर इंग्लैंड की तरह यहां जमींदार, किसान, और मजदूर, तीन वर्ग नहीं हैं; क्योंकि जो लोग एक समय दूसरों के लिए काम करते हैं, उनके पास भी अपना घर और कुछ जमीन होती है। कुलू का किसान अगर अपने जमींदार को नाराज कर भी दे तो उसे अपने घर से निकाले जाने और आजीविका के सभी साधनों से वंचित होने का खतरा नहीं।

Ploughing the rice-fields, Kais 1980s. Image © Wolfgang Himmel.

खेती के अलावा अन्य पारंपरिक व्यवसाय हैं: चमड़े का काम; पत्थर, धातु और लकड़ी का काम। लेकिन सबसे ऊंची और सबसे निचली जातियां, एक तरफ ब्राह्मण तथा राजपूत और दूसरी तरफ मेहतर, सभी कांगड़ा से आए हैं। ‛झीर’ या मछुआरा जाति भी।

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लोकानुरंजन

कुलू में पुरुषों और महिलाओं का प्रमुख मनोरंजन ‛जाच’ या धार्मिक त्योहार है। सुल्तानपुर के पास बड़े मैदान में आयोजित होने वाला दशेरा (दशहरा) इनमें प्रमुख है, लेकिन पूरी घाटी में अलग-अलग जगहों पर त्योहार मनाए जाते हैं। कुछ जैसे भेखळी और भुइण जाच हर साल आयोजित होते हैं और कुछ एक समय अंतराल के बाद, जैसे कि हर तीन साल में आयोजित होने वाली काहिका जाच। त्योहार एक दूसरे से ज्यादा अलग नहीं होते, सिवाय इसके कि कुछ में अन्य की तुलना अधिक देवता और लोग भाग लेते हैं। महिलाएं गहने और पुरुष अपने सबसे अच्छे कपड़े पहनते हैं और गले में फूलों की माला लटकाते हैं, क्योंकि कुल्वी लोगों के चरित्र में एक सबसे खास बात है उनका फूलों के प्रति भरपूर प्रेम। पुरुष अपने देवता के रथ के चारों ओर घेरा बना कर नृत्य करते हैं, जबकि देवता के सेवक अपने वाद्ययंत्र बजाते हैं। स्थानीय निवासी दूर से आए मित्रों को भोजन और आवास प्रदान करते हैं, और सबसे महत्वपूर्ण, भरपूर लुगड़ी। सराज में अभी भी, होमरिक यूनान की तरह, घर की महिलाओं द्वारा अतिथि को स्नान करवाने का रिवाज है। और इसमें, शायद कहने की आवश्यकता नहीं, शालीनता और शिष्टता का पूरा सम्मान किया जाता है।

A Kulu man dancing in a ‘jach’ or mela. Image © Arun Chaudhary.

त्योहारों में पहली बार गाए गीत ही फिर पूरे कुलू में प्रचलित हो जाते हैं। कभी-कभी ये स्थानीय इतिहास की घटनाओं से जुड़े होते हैं, और इस तरह [घटनाएं] लोक-स्मरण में कई वर्षों तक संरक्षित रहती हैं। कुलू आए पहले अंग्रेजों के कार्यों को अभी तक भुलाया नहीं गया है। अन्य गीत काव्य के सभी चिर-परिचित विषयों से संबंधित हैं। इनमें से एक कुल्वी बोली के छोटे से नमूने के रूप में दिया जा सकता है:

सेभ फुळू, भर फुळू तलोला,
शाउण-भादर एज़ासी फिरि घिरिया,
ज़ुआनी एक कलोला।

सब ओर फूल खिले हैं, गुलाब भी भरपूर खिला है,

गर्मियों के महीने फिर लौट आएंगे,

लेकिन जवानी का फूल केवल एक बार खिलता है।

मृत्यु

खेत-बाड़ी के दैनिक कार्य में, एक आध जाच की चहलपहल के साथ, कुल्वी किसान का जीवन अपने गंतव्य पर आ पहुंचता है। जब ऐसा होता है और अंतिम श्वास ले ली गयी है, तो मृत व्यक्ति के शरीर को अविलंब दाह संस्कार के लिए ले जाया जाता है। अगले पांच दिनों तक सगे-संबंधी केवल मध्याह्न भोजन लेते हैं, जिसमें रोटी और दाल होती है। भोजन शुरू करने से पहले वो एक हिस्सा दिवंगत के लिए कुछ ‛धूप’ के साथ घर के बाहर एक पत्थर पर अलग रख देते हैं। कौवे खाना उठाने आते हैं, लेकिन एक कौवा हमेशा अकेला आता है, और इस कौवे में दिवंगत की आत्मा होती है।

पांचवें दिन सुन्धा नामक अनुष्ठान होता है। एक बकरे की बलि दी जाती है और मांस सगे-संबंधियों और गरीबों में बाँट दिया जाता है। मृत व्यक्ति के नाम पर दूर के रिश्तेदारों को उपहार देना आम है, जो भारत के अन्य हिस्सों में एक ब्राह्मण को दिए जाते हैं। इस अनुष्ठान के बाद परिजन उपवास करना बंद कर देते हैं। चार वर्षों बाद ‛च़बर्खा’ होता है, जब एक बार फिर दूर के संबंधियों को उपहार दिए जाते हैं।

धर्म, भाषा और जाति

कुल्वी लोगों के धर्म, नस्ल और भाषा पर भी कुछ कहा जाना चाहिए, लेकिन ये ऐसे विषय हैं जिनका उचित विश्लेषण एक संस्कृत विद्वान ही कर सकता है, और मुझे यहां केवल व्यक्तिगत अवलोकन तक ही सीमित रहना चाहिए।

हिंदू धर्म की, जहां तक मुझे लगता है, तीन खास विशेषताएं हैं: (१) जाति व्यवस्था, (२) ब्राह्मणों का प्रभुत्व, (३) गौ श्रद्धा। अब इनमें से पहला और तीसरा कुलू में भी उतनी ही दृढ़ता से माने जाते हैं जितना कि भारत में और कहीं भी, और इसलिए निवासियों को हिन्दू कहा जा सकता है, लेकिन दूसरी विशेषता यहाँ नदारद है। जैसा कि पहले ही उल्लेख किया जा चुका है, विवाह या अंतिम क्रिया-करम में ब्राह्मण की आवश्यकता नहीं पड़ती। कुछ साल पहले एक कुल्वी मित्र ने मुझे बताया था कि राजपूत ब्राह्मणों की तुलना में अधिक सम्मानित थे, उन्होंने वास्तव में यह बात ब्राह्मणों को एक भिक्षुक जाति बताते हुए कुछ अवमानना के साथ कही थी। अभी हाल ही में मैंने अच्छे परिवार के एक राजपूत को जिले के ब्राह्मण ज़मींदारों की तुलना अधिक महत्व मिलता देखा है।

ऐसा प्रतीत होता है कि प्राचीन भारत में दोनों जातियों की बराबर प्रतिष्ठा थी। रिह्स डेविड्स कहते हैं:

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ब्राह्मणों का ‛निम्न’ कहलाया जाना, ब्राह्मण अभिमान (चाहे वो आज का भारत हो या मनु-स्मृति और महाकाव्यों जैसी धार्मिक पुस्तकें) से परिचित लोगों को बहुत आश्चर्यजनक लग सकता है। मगर राजाओं और अभिजात्यों की तुलना में उनके लिए यही विशेषण प्रयुक्त होता था। इससे प्राचीन काल में उनकी तुलनात्मक महत्ता के प्रति हमारा ज्ञानवर्धन होना चाहिए।

Deities and devotees, Upper Kulu 1910s. Source: Kangra District Gazetteer 1917.

कुलू में खान-पान से जुड़े जाति-नियमों का पालन होता है और शायद मैदानी इलाकों की तुलना में कहीं अधिक सख्ती से, क्योंकि बच्चों में बहुत छोटे से ही इनपे ज़ोर दिया जाता है। हालांकि जाति व्यवस्था में दक्षिण भारत में मिलने वाले दमनकारी लक्षण नहीं हैं। ऐसी कोई जाति नहीं जिसकी मात्र उपस्थिति को दूषण माना जाता हो। कोई भी, एक चमार या मेहतर भी, गांव के देवता की पूजा से वर्जित नहीं। वास्तव में, मुझे बताया गया है, इस प्रकार के किसी भी बहिष्कार से देवता को नाराज़गी होगी क्योंकि उसे गांव के सभी लोगों द्वारा पूजा जाना पसंद है। कहा जाता है, प्राचीन भारत में “ऐसी रंगरूप पर आधारित घृणा नहीं हो सकती जो आज की उच्च और पिछड़ी जातियों के बीच है” और यह बात आज के कुलू में यथासत्य है। अमेरिका में नीग्रो लोगों के प्रति एक श्वेत जो भावना रखता है, वैसा यहां कुछ भी नहीं है। अमेरिकी एक नीग्रो महिला के साथ शादी या अवैध संबंध तक स्वीकार नहीं करेगा। वह नीग्रो को एक ही मेज़ पर बैठने की अनुमति नहीं देगा, क्योंकि इसका मतलब होगा बराबरी। लेकिन उसे एक नीग्रो के हाथों भोजन परोसने पर कोई आपत्ति नहीं, और वास्तव में ही, कई अमेरिकी होटलों में वेटर नीग्रो हैं। इसके विपरीत, एक हिन्दू मुसलमान के हाथों भोजन नहीं लेगा, लेकिन वह, कम से कम कुल्लू में, मुसलमान को नीचा नहीं मानता है। जहां तक हिंदू धर्म की तीसरी विशेषता की बात है, भारत में ऐसी कोई जगह नहीं जहां गाय को कुलू की तुलना अधिक स्नेह के साथ माना जाता है। यहां तक कि घाटी में रहने वाले मुसलमानों और अंग्रेजों को भी अपने हिन्दू पड़ोसियों की भावना का बहुत सम्मान है।

जैसा कि मैं एक भाषाविद नहीं हूं, मैं यह नहीं कह सकता कि कुलू बोली का अन्य भारतीय बोलियों से क्या संबंध है, लेकिन एक आम आदमी के लिए भी यह स्पष्ट है कि कुछ शब्दों के रूप संबंधित हिन्दी के शब्दों की तुलना पुराने हैं; उदाहरण के लिए, त्राई, तीन। का, के, की का स्थान रा, रे, री ले लेते हैं, इस प्रकार: रिड़कू का घर = रिड़कू रा घॉर। ‛बे’ हिन्दी के ‛को’ के समान है: घॉरा बे जाणा = घर को जाना। करण कारक के लिए ‛मैं,’ और कर्ता कारक के लिए ‛हांउ’ प्रयुक्त होता है: मैं लिखू = मैंने लिखा; हांउ लिखनू = मैं लिखूंगा।

मैदानी इलाकों के लोगों की तुलना में कुल्लू के लोग हल्के रंग के हैं, और कभी कभार, सुंदर बाल और नीली आंखों वाले होते हैं। उनकी मुखाकृति यूरोपियनों से ज्यादा भिन्न नहीं है। शिवजी का प्रधान ‛गूर’ बहुत हद तक मेरे एक पुराने स्कॉच (स्कॉटलैंड वासी) मित्र की तरह है। सभी जातियां मुखाकृति और रंगरूप में एक दूसरे से मिलती जुलती हैं, और अब तक मैंने देखा है, यह मानने का कोई कारण नहीं कि जातीय भिन्नता का मतलब नस्लीय भिन्नता हो।

घाटी में बसे कुछ मुसलमान भारत के अन्य हिस्सों से आए हैं, ज्यादातर पंजाब से। अपने हिन्दू पड़ोसियों से उनका बेहद सौहार्दपूर्ण संबंध है। निस्संदेह कुलू में जाति या धर्म या राजनीति का संघर्ष अज्ञात है।

‛इंपीरियल गजेटियर ऑफ इंडिया’ के खण्ड 1, पृष्ठ 295, में लिखा है: “हिमालय, नेपाल, असम, और बर्मा के मंगोलॉयड जाति के द्योतक लाहुल और कुलू के कणैत हैं… सिर चौड़ा; रंग गहरा हल्का सा पीलापन लिए; चेहरे पर बाल बहुत कम; कद छोटा या औसत से कम; नाक कुछ ज्यादा चौड़ी; चेहरा स्वभावतया सपाट; पलकें प्रायः तिरछी”।

यह उन कुल्वी लोगों पर लागू नहीं होता जिन्हें मैंने खुद देखा है, चाहे कणैत हों या अन्य जातियां। वे सामान्यता गोरखाओं की तरह सुस्पष्ट नाटे नहीं हैं। उनके चेहरे सपाट नहीं हैं और न ही आँखें तिरछी। वे लाहुलियों से रंगरूप, भाषा और रीति-रिवाजों में भिन्न हैं।

इतिश्री।

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