जोगणी

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पुरोहित चंद्रशेखर ‛बेबस’ की कुळूई-पहाड़ी में लिखी एक लघु कथा


ज़ेबै मेरी लाड़ी कल्याणी बै उभरदै दूई राती त्राई ध्याड़ै हुऐ, रेशमा साही च़ोढ़ा बगड़ा घाह ता नुहार घाट मुड़दै साही फीरै। मूंडा धुणकी धुणकी ऐ औध मुंई हुई। ता सीभी बै शूरश लागी लागदी, सारे आपणे पराये व्याकल होइऐ सोच़ा न पौऐ। आपणे घौरै ता ताल ए बिगड़ी रौहूंदा थी। ज़बै हाऊं घौरा न आमां सैंघै फार्मा न पूजू, सारै डाक्टर च़ुप थी।

जै़ कोई डाक्टर बमारी रा नां डाही बी देआ थी ता तेतैरी ओक्त नईं थी लागदी। वैद बोला थी ऐ पिणसरी रोग नी आथी ओपरा सा, एतै रा लाज़ टाणगारी केरा सी। बडै घाइणे आळै लोका ता च़ुप थी पर कलर्क चपड़ासी होर थोड़ी आमदनी आळै लोका न चूहमचूही घूमीदी थी जै़, “भाई ईना डाक्टरा बैदा की केरना, ऐता ओपरै री मार सा, देऊ-देवता, च़ेटू-भूत, जादू-टूणा सा। ईंना बै टाणगरी पौऊ तोपणा।”

बेटी री बमारी रा पता मिलू ता मेरै शाहुरी बी पूजै। पर कल्याणीऐ ते पछियाणे बी नी, ते बी हादुऐ। मेरी आमा बी न्हूशै रै लोभा च़ाऊ केरदी आईं थी। पर सौ, अंढि नी हादुई, सौ एसा गल्ला बै शुन्न थी जै़ ए लोक अंढै कीबै हादुऐ होलै। द्याउणी गौःर ग्रांहुंज़ी री नपौढ़ बेटड़ी नांढै-टाटै साही मौंझ़लै द्वारा पांधै’न आपणी फूला साही बांकी न्हूशा बै उभरदी झ़ाकीऐ लौज़ै पीछ़ै हटी ज़ाआ थी, पर ज़ाबै दा: लागी ता न्हूशा बै फाढ़ै न लैयै झ़ूरा थी पर डौरै कोई सलाह नोळा थी देई। एकता सैहर सरकारी बांगला अंग्रेज़ी ठाठ आमाबै पाखलै लागै। हर बौगत बडै छ़ोटै अफसर मलाज़म ता लोका बेठेैदै रौहा थी, तबै आगे नईं थी एंदी। पर तदी सौंझ़ा तेसै मोका ज़ांचीऐ कौड़छ़ी न औग आणी तेतान धूप पाऊ ता न्हूशा कौछ़ै खौढुइऐ कौड़छ़ी रा धुंआं देंदी च़ौहू कनारै फीरदी किछ़ ढूणदी ज़ेही लागीदी थी। हाऊं ता मेरी शौशू मौंझ़लै द्वारै रै लउऐ न हेरदै शूणदै रौहै।

सौ थी बीलदी “ओ मेरै कुलैरै ग्राएं रै देउ-देवीओं वीरों वतालों! तूसा रै बला लाये आसारा बाधा हुआ। जै़ तूसारा दोश खोट सा ता तेई दसा! जै़ होरी रा सा ता वारोवार केरा, आसरै तूसैहै सी। केरा एसरी रछया आसै ताबेदार सी।” सैंघै कौड़छ़ी मौथै सैंघै लाई ता आपणै कमरै बै भगी। आसै भीतरै आऐ ता कमरा धूएं भौरी थी, ता कल्याणी तेई धूपा शू शू केरिऐ शींगदी-पींदी जैह लागी दी थी। तैबै न पोरै किछ़ उभरना बी ठाकुआ ता राती निंदर बी आई। दोती औठ बज़दै-बज़दै सारैन खबर फैली जै़ औज़ साहबै री बीबी बै किछ़ राम सा। एक होरी बै पुछ़ा थी जै़ किज़िऐ हुआ राम? तांबै आमै भी केरू सौंझ़ा आळा ताल।

पर अबै तेई धूपै रा उल्टा ऐ असर हुआ। उभरना बी च़मकू, सैंधै कच़ींच़ा मारदी लागी। तबै आमै धूपैरी कौड़छ़ी कल्याणी आगै डाहिऐ पुछ़ी, बोल बोल कुणसा तू, कीबै आऊ, की तोपा सा, एसै शोहरीए तेरा की बगाड़ू? आमै एतरा ऐ पूछ़ू थी ता कल्याणी ज़ोरै ज़ोरै बकदी ता कच़ींच़ा मारदी लागी सैंघै बोलू “दसनू हाऊं, हाऊं कुणसा, एई बाबूजी! कौखै सा तू? (सौ जी सैंघै बी तू केरिए ढूणा थी) एई बाबूआ शूण, शूण बाबूजी, रामी आई तेरे घौरा, पर एबे हाऊं जोगणी सा, भाटकुंआरी जोगणी, हांऊ मूई नी आथी मैं आपणा पींडा त्यागू। सौ पींडा छौडू सौ लोकै-लूचै शीउळी बाज़िए, गटै ता बोली मारिए ब्याह रच़ाणा लाऊ, रामी झ़णाटुई सैंघै भाटकुंआरी तेई पींडै बै रीढ़ी पांधै शेटिऐ भगी। तौ नहाळदी रौही तौ धर्मी निहाळदी। तू निहाळू भाळू लाड़ी बी भाळी, तूसै दू है मेरै आमा-बापू, भाई, लाड़ै-लाड़ी सभ किछ़ सी। मैं एसा बै कष्ट धीना आपणी गल शणाणे बै। अबै हाऊं एसरी पूरी रछया केरनू। पर बाबू जी दूई त्राई गला मेरी बी पौई सी मनणी। बोल मनला की नई। केरला की नईं, शुण बाबू जी बड़ी करड़ी नीं आथी। बोल च़ुप कीबै बेठा? “बस एतरी ज़ैं मेरी मूरत तू ज़ुण आपू बणाआ सा आपणे गौळा न बरोबर पाई डाही, दूजै देऊ पुरै री ‘जोगणी रीढ़ी’ पांधै ज़ाइए सदा बौरश च़ाकरी देइ केरी। एक गल होर शूण, गोरू रै खूढ़ै री पिछ़ली कूणी न मैं डाबै भीतरै रपैयै सी पौथैदै, आमा बोला थी दस झ़ार सी, तेतै लायै मेरा च़वर्खा केरी। एतरी गल सा मेरी, बस हाऊं नौठी” बस एतरा बोलू सैंघै कल्याणी वसुद्धि पौई ज़ंडी सूती।

देऊ पुर, रामी, भाटकुंआरी, ऐ त्राहै नां मूंबै नौएं ता नंई थी आथी, देऊपुरै रै लोकै मूंबै भाटकुंआरी री कथा बी शणाई थी ता आमै बी।

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देऊपुरा आसारी तसील ठाणा सा, मोटर सड़का पांधै सौत-अठ झ़ार बौसुआ रा कस्बा नौई रै बीढ़ा पौधरै न। मेरा ग्रां तौखै न आगे धारा पांधै सा, एसै गलै हाऊं कृषि कालज पास केरिए देऊ पुर ऐ रौहु, ज़ै कधकी वलायत ज़ाणे रा हुकम हासल डाक ता खबारा मिलदी रौहान। तौखै मेरी बुआ रौहा थी। सौ तेसरा आपणा घौर ता नईं थी आथी पर होणी रा च़कर किछ़ अंडा च़ौलू ज़ै आपणे न बध हुआ। मेरी एसा दसोघा बुआ रा शाहुरा आसा सैंघलै ग्रां न ऐ थी। घौर बी ज़ड़कदा ता लाड़ा बी, पर बुआ बुआ बणी तौखै बडै बाबै री बेटी, बड़ी करकशा। सौ शौशू-शौहरै, देउरा-ज़ेठा ता टबरा सैंघै नीछ़ी बणी। दयाउणे धर्म चन्द मामा (फूफा) बै खरी खासी ज़िमीदारी शेटिऐ बज़ारा मसद्दी बोलणे कराड़ा आघै नोकर बेशणा पौऊ। मसद्दी थी ता ममूली ज़ां: दकानदार पर बौरशा एकी न सौ खरा ठुणकदा होई गोउ थी। उंईरी बी एक नुआरी ऐ कथा सा।

हिउंदा एक साधु बाबा शेळै कौमदा लालै री हाटी आऊ, तेयै किछ़ कपड़े रा सुआल केरू, मसद्दीए तेई बै एक पराणा ज़ां: च़ादरू आपणी मुईंदी लाड़ी रै नां पांधै धीना। बाबै बी लालै बै शूकी सीस केल्ही नी धीनी, झ़ोळी न कौढ़िए दूई बडैर पौतर बी धीनै, बोलू “लै भगता आसा, डैंठी आगै होर की होणा, ऐ घाह-पौच ऐ होआ सी। एई पौचैरी एक टुकरी गचला प्यारदी घेरे एक घाणी तमाकू न प्यारीऐ बेच़ला ता भगवान तौबै तारी देला। ऐ बूटी ज़ोता हेठलै ग्रांएं री च़ाहड़ी न सा, होरतै बी होली, अच्छा नारायण हरि”।

लालै तदी ऐ परेखणी केरी। सच़िऐ अंढा स्वाद आऊ ज़ै नरेळी छौ़डणै बै ज़ीऊ नीछ़ा बोली। सैंघै किछ़ नशा ज़ां: बी। बस तेई तमाकू री अंढी मश्हूरी हुई ज़ै लालै पौतरा तोपदै ज़ाणा लागा पौड़दा। शाहूकार ता हुआ। पर एक घेरै अंडा ढौगै पौऊ ज़ै औंग बाहीं चोड़ीऐ सदा बै मांज़ा ढौकणा पौऊ। तिनाहै ध्याड़े न लालै रै भागै धर्मचन्द मामा घौरा न झ़णाटुइऐ लालै आगै बेठा। थोड़ै ध्याड़ै पिछ़ै दसोघा बुआ बी तौखै ऐ आई, अबै छ़ड़कदे लालै रा आंधर बाहर ठीक च़ौली पौऊ। एतरी ऐ गला मैं आपु बुआ न ता ओरै पोरै न शुणिए ज़ाणी थी। पर किछ़ गला हाज़ी बी धाउड़ी थी। चितर पूरा नईं थी बुझ़िदा।

Man smoking from hookah, ca. 1935.

ज़ीना ध्याड़ै न हाऊं तौखै पूजू मामा धर्म चन्द मौरीऐ बुआ रौंडुई चुकीदी थी। सैहरा रौहीऐ हरिद्वारै रा रामनामी घुंडू ओढ़ीऐ रोज़ भ्याणसरै रामी सैंघै नौई न्हाइंदी ज़ा थी। बारा म्हीने हीउंद भरियाळ सौ नपौढ़ बेटड़ी शूणै शणाऐ भजना गांदी गौल्ही बौतीऐ ज़बै टप्पा थी, ता लोक रात भ्याणे रा पता लाआ थी, पहले ज़बै सौ “कंबल नेतर कट पटंबर (कमल नेत्र कटि पीतांबर)” की “उठो री नागण नाग मारो जागके” गाs थी ता लोक हौसा थी, पर अबै गल पराणी होई चुकी थी। छ़ूघीणे न ता गंदी च़ीज़ा न डौरीऐ छ़बकै मारदी च़ौ ला थी, ता लोका बै तमासा होआ थी। एतरीऐ गला ता मैं टुकड़ै मुकड़ै ज़ोड़िए कथ बणाई। पर रामी रै बारै न कौसीऐ गल नी च़लाई। ऐ गल हाऊं रोज़ सौठा थी ज़ै ऐ शोहरी औखे कुण, की, ता कीबै सा? बुझ़िया ता पूरी ग्रांहुंज़ी री कुंवारी शोहरी थी, पर आपणे नातै सातै न ता सौ कौहिंच़ै मैं भाळीदी नईं थी, मैं बूझ़ू कबकै लाला तमाकू पींदेआ एसरी गल बी लाणी। कीबै ज़ै ते गला लाणे बै बड़ै तरसदै रौहा थी। पर किच़की गल च़ौली ऐ नी। रामी 16-17 बौरशै री खरी लौमी तकड़ी शो:री थी। बुआ आगै ज़ाणकार बेटी साही सारै घौरै रा कौम बड़ी चतरयाई सैंघै केरा थी, कदी झ़ीकीदी बकदी नी भाळी शूणी। रोटी टुकड़ा, गोरू-बौछ़ू , हांधरै बाहरला कुल कौम मशीना साहीं केरा थी। थोड़ी थोड़ी देरिए लाला बै तमाकू बी भौरी देआ थी, ईनै गलै लाला बी ता बुआ बी कुछी री बेटी साहीं तेसा बै मना थी। रामी होछ़ी न बड़ी ता हुई सैहरा पर लाण तेसै ठेठ ग्राहुंज़ी रा है लाआ थी, च़ाधरू, गाची, नांगा ताळू।

मैं पाखली ज़गा न मन लाणे बै हौथ रेडियो संघै फोटो ता मूरती तसवीरा बणाणे रा समान ता हौथै री रेखा भाळने रै समुद्री शास्त्रे री पोथी भी संघै आणेदै थी, सारी ध्याड़ कभकै मूर्ति वणांदा, फोटू तुआरदा, ता हौथै री रेखा न माण्हू रै भाग पौढ़दा पछ़ियाणदा रौहा थी। राती लालटैना न किछ़ मज़ा नईं थी एज़दा। गाई दूंहदी बुआ बौछ़ू ढौकदी रामी, ता मांज़ै पांधै तमाकू पींदै मसद्दी री मूरत भाळिऐ बुआ ता लाला खुशी केल्है हुऐ पर रामी ता ज़ंढी बचकत है हुई। घड़िऐ मूंबै भाळदी घड़िऐ मूर्ति बै, अबै सौ एंदै ज़ांदै सीभी मूर्ति भाळदी खौढ़ीदी लागी, ज़बै ज़ै: छ़ौण लागदा मेरै मूंडा पांधै एज़िऐ खौड़िया थी पर आसा आपू बखुली गल बात नईं थी होंदी।

एक ध्याड़ै हाऊं समुद्री शास्त्रा पौढ़दा थी ता मुंबै एक बेटड़ी रा हौथ भाळने री ज़रूरत पौई, ता मैं रामी बै बोलू, “रामीऐ औखै बेश ता भला”। सौ जंढी निहाळदी थी लागीदी, टप बेठी, मैं हौथ सीधा करियाऊ सौ बी हुआ, मैं एकी हौथा न पोथी ढौकी होरी हौथै रामी रा हौथ। ज़ां मैं तेसरै हौथै री रेखा भाळी ता मेरी होश उडी। सारी रेखा जंढा धागे रा बूदा बणी दी। एक वी रेख टकाणे री नी, ना उंवर, ना ढबुआ टका। मा, बाब, भाई, बैहणी, लाड़ा, लुआद, सब किछ़ जंढा कचोटिए शेटूदा। पर तेसा बै की पता थी ज़ै हौथा पांधै माण्हू रै भाग लिखैदै होआ सी। सौ बड़ी रिहान थी ज़ै बाबू घड़घड़ीऐ पोथी ता मेरै हौथा भाळीए कीबै दुआसी दै लागै, अबै मूंबै तेसा पांधै बड़ी दया आई ज़ै पता नी अंढी ऐ नभागी शो:री कौसरी होली, ज़ौसरा सारा ज़नम कौसकी बैरीऐ जंढा पूंझ़ीऐ कचोटिए डाहूदा, तबै मैं सौ पूछ़ी ऐ शेटी ज़ै भला रामीऐ तू कूण कौसरी बेटी सा ता औखे कंढै पूजी। तबै तेसै आपणी गडमड ज़ेंही बोली न दसू ज़ै मैं शूणूदा सा ज़ै हाऊं आमा (दसोघा बुआ) रै ग्रांएं रै भाटै (बाह्मणे) री बेटी सा। मेरी मां ता मूंबै ढाई बौरशै री शटीए मूंई थी, हाऊं मेरी दादीए पाळी थी, ज़बै हाऊं दसा ग्यारा बौरशै री होंदी तबै मेरै गौळा न बड़ै-बड़ै दुखणे निकतै, बड़ी दाह होआ थी, ग्रांहुंज़ी जाड़ा माड़ा ता छ़ूडा लाऊ पर ते नी ताज़ूऐ, मेरी बुरी दशा हुई।

एकी ध्याड़ै धर्म चन्द ताऊ ग्रां बै आऊ। तेइऐ मेरी दशा भाळीऐ बापू बै बोलू, “शूण गिरिधर प्रोहता! ज़ै शो:री बच़ाणी सा ता सीधा अस्पताळा बै च़ला, तौखै आसा आगै रौही, मूंबी आपणा प्रेशन केरना सा, मेरै बी ढौगै पौड़ीए पाशड़ै चूटेदै बोला सी। हाऊं बड़ी मुश्कलै घौरा बलांइदा आऊ, फिरी पता नी मिलीणा की नईं”, सैंघै ते रोऐ थी। हाऊं अस्पताळा दाखल हुई, लाज़ लागा, ताऊ री बी च़ीरफाड़ हुई, दूई बोतली लोहू बापूए बी धीना पर ताऊ नी बच़ू।

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मूंबै औठ म्हीने अस्पताळा हुऐ। आमा रोज़ एज़ा थी। बापू बी सौंझ़ा दोती फेरी पा थी। ध्याड़ी हाटी बेशा थी। कधकी 3-4 ध्याड़ै दूरा बै ज़ा थी। एकी ध्याड़ै अस्पताळे रै सारै रोगी कौमी ता डाक्टर मूंबै बड़ै झ़ूरदे बुझ़ुऐ। आपु न घुस-पुस केरदै ढूंणदै लागै पर मूं सैंघै किछ़ नीछ़ै ढूणी। असली न अस्पताळा मेरा घौर ज़ां थी बणूदा, एंदै ज़ांदै रोगी कर्मचारी सीभ मूंबै झ़ूरा थी। डाक्टर नाम ठठा केरा थी ज़ै कौ सा ड़ै सौ रामी, मूंईं ता नईं, की ऐ रौंडै तू अस्पताळा री मालकण बणी बेठीदी। ज़ाणे रा नां नी लेंदी, धीरी हो तेरा गौळ काटणा। हाऊं बी रोगी लोकै रै ता कर्मचारी लोकै रै छ़ोटै मोटै कौम, पाणी-धाणी च़िक छ़ोटी रै भांडै देणे, ओरै पोरै समाद पजाणे रा कौम केरिऐ खुशी डाहा थी। अंडी गला बै सीभ मूंबै हाका पाआ थी। तदी मैं भाळू सीभ मूंबै भाळदै सी पर मूं सैंघै ढूणदै कीबै नी? हाऊं सोठदी है थी तेतरैन रोंदी-रोंदी आमा हांधरै आई तेसै हांऊं हीका सैंघै लाई। बोलू मत डौरै बेटीए बापू नी रौहू ता हांऊं ता सा हांऊं है तेरी आमा, बापू सभ किछ़ सा। हांऊं तोबै आपू आगै डाहनू आपणी बेटी बोलिए ब्याह शादी केरनू तौबै घाटा नी केरदी। “कीबै आमा बापू कौबै नौठा”, मैं बोलू। आमै बोलू, “सौ बड़ी दूरा बै नौठा बेटीए बड़ै बोहू ध्याड़ीऐ एणा तेई”, मैं बापू री नुहार बी नी भाळी।

तूईं रै देहुड़ी एकी म्हीने पीछ़ै मूंबै छ़ुटी मिली ता सीभीऐ हांऊ अंडी विदा केरी ज़ंढै कौसी कर्मचारी री बदळी हुई होए। तदकी पौंज़ छ़ौ: बौरशा नोर हाऊं औखैहै सा।

होर आमा मूंबै सच़िऐ.दादी न वी बध झ़ूरा सा। लाला होरा बी कदी नराज़ नी होंदै। ज़ूठै भांडै नाम नी मांज़णै देंदै। बोला सी कुआरी शोहरी सा, सौ बी बाह्मणै री, पाप लागला। “ता तेरै बापू रा पता लागा किछ़”, मैं पूछ़ी। तेसै बोला, “ज़ौस मोकै आमा मूंबै हीका सैंघै लांदी लागीदी थी, अस्पताळा न तेई मोकै पोरै धीरै ल्हाश घौरा ना बापू री लोथ थी पौईदी औगीन सोणे बै निहाळदी। मैं अंढा वी शूणू ज़ै बापू री ज़ान बी तौखै नौठी ज़ौखै लाला होर लै ता धर्म चन्द ताऊ रै हाड़ पाशड़ै चूटै थी। बोला थी तेई ढौगा न कोई वनास्ती सा ज़ौसरी दौलत लाला शाहूकार हुआ। एई घौरान मूंबै एतरी झ़ूरी प्यार मिलू ज़ै मैं कौसी री पर्वा नी केरी। अबै बाबू जी बोहू सारी गला हाऊं फ्याड़दी लागी। कई गले रा मूंबै हाज़ी बी पता नी लागदा। ज़ेत ज़ेतरी मूंबै अकल एज़दी ज़ाऐ केरा सा, तेतरा मेरे मना रा दुख वधदा ज़ाए केरा सा। मनान बड़ी दाह लागी उठा केरदी, बूझ़ा सा संसारा न आपणा बोलणे बै मेरा कोई नी रौहू। बोला सी घौरा मेरे बापू रै हेसै री सारी ज़ाए ज़ात मेरै नाएं सा। पर तेसरा की केरनू। औखै की घाटा सा, डौर ता बड़ी ऐ सा ज़ै “कौहिंच़ै आमा बै बी किछ़….. याजिऐ तबै की केरनू”। अंढा ढूणदेआ तेसै दूहै हौछी ज़ोरा लाये मीटी ता दूहै मुठी बी ज़ोरै बाटी। मूंड धुणकू। बुझ़णा तेता न आगै किछ़ नी रौहणा।

“तेरा ब्याह”, मैं बोलू, “छ़ेकै केरी देणै बै हांऊ बुआ बै बोलनू रामीए”! तबै….. “नंई नंईड़ै बाबू जी”, रामीऐ मेरी गल टोकीऐ बोलू, “आमा बै ता आपू ब्याहे री झ़ौख सा। मैं कई घेरै लाला जी सैंघै बी ढूणढ़ी शूणी। ते दूहै बडै झ़ूरी चाबै मेरा ब्याह केरना चाहा सी पर…..” तबै तेसै ऐ गल औखै रोकी ता सोच़ा न ज़ैंही पौई। मैं भी पूछ़ी, “कीबै रामीऐ तू च़ुप कीबै हुई। गल धाउड़ी नी रौही?” तबै बी सौ च़ुपहै रौही। तांबै बुऐ तेसा बै हाक पाई। सौ अंढी भगी जंडी कैदी न छ़ूटी।

रामी आपू ता तौखै न भौगी पर हांऊ तेसरी चुपी न बुरी भांतीए फसी रौहू। हांऊ सोठा थी ज़ै एसा गला पांधै एज़िये ऐ रामी च़ुप बेशा सा। एतान ज़रूर कोई भेद सा। कोई डौर की किछ़ होर गड़बड़ी, अबै मूंबै तेसरी बड़ी झ़ूरी झ़ौंख होई गयी। सौ अबै सोरी ज़ेही बी लागदी थी, ता द्याउणी सौ बी एंदै ज़ादै कोई न कोई गल ज़रूर केरी ज़ा थी। चित्रकारी केरदी घेरै ता सौ सैंघै लगीऐ बेशा थी। कई घेरै मेरे पटा पांधै आरखण ता कई घेरै खौवा पांधै मुंड डाळी देआ थी। तेसरी अंढीए सारी गला कौसी छल पाप, वासना संघै नई, बल्कै नभौळी होइए अपणाइत केरिऐ च़ोखै शुचै मने केरा थी। पर औरै धीरै मेरा मन होर ज़ांहू: फीरू थी। मूंबै तेसरा नेड़ बेशणा मीठा ता दूर ज़ाणा बुरा लागदा लागा; तेसै बी उठणा बेशणा बोहू केरी धीना ता मूंबै बी सौ गौमदा लागा, पर तेसरै ता मेरे सोठणे न बड़ा फर्क थी। हाऊं ता तेसा सैंघै ब्याह केरने री बी सोठदा लागा थी, पर तबै बी मैं कोई वधकी गल नी केरी, न ढूणी। किछ़ डौरै, किछ़ मानदारीऐ ता किछ़ हाळ-च़ाळ भाळिए।

होरी धीरे बुआरै कौन बी खड़े हुऐ। तेसरा पौहरा बी करड़ा फिरू। बुआ आघै बी आसा पांधै ओपरी-ओपरी नज़र डाहा थी। पर औज़ काल सौ ज़र डूघी होई गई थी। हांऊ एई पोहरै न किछ़ कदरी गैऊ थी। ज़ै कौहिंच़ै म्हारै एई ढूणने-टूणने रा उल्टा अर्थ नी लोड़ी केरू, पर पीछ़ै न पता लागा ज़ै बुआ री एई पौहरा पाणे री किछ़ होरहै नीत थी। ज़बै तेसै एक ध्याड़ै मून पूछ़ीहै ठोकू, बोलू, “नाड़ै बेटेआ ज़ै सिंवा, हांऊ भाळै केरा सा ज़ै औज़ काल रामी तौ सैंघै किछ़ ल्याड़ी दी लागीदी सा”, बुआ एतराहै बोली सकी थी कि मैं तां बै ताउळी सैंघै टोकी, “नंई नंई बूआ जी, अंढी गल नी आथी। ए पता नी कीबै एतरी मूं सैंघै ल्याड़िया सा पर एसै बी औज़ा तैयें कोई वधकी गल हरकत नी केरी। नांहै मैं कदी गल सोठी। एसा….. एतरा बोलदा-बोलदा हांऊ बड़ा हादूआ ज़ां ज़ंडा कोई झ़ूठ-मूठ च़ोरी न ढोकुआ होए। पर बुए आपूहै मेरा वहम काटू, बोलू, “नंई बुआ मैं तौबै वदी थोड़ी है लाई। हांऊ ता ऐ पता लाणा च़ाहा सा ज़ै ईना ध्याड़ै एसै कोई अंढी गल हरकत बी केरी ज़ौस गलै पता लागै ज़ै एसरी मर्ज़ी कौसकी मरधा धीरै….. कोई पींडै री भूख….. अबै हांऊ तौ सैंघै की बोलनू हांऊ भाळे केरा सा ऐ शोहरी 17-18 बौरशै री होई आई पर एसा न बेटड़ी आळा कोई ढंग नी ज़ागदा। मरधै की ब्याह नांए एसा रती लोभ च़ाऊ नी होंदा। औज़ काल 10-12 बौरशै री शोहरी बै पांख लागा सी। रामी बै थोगा है नी, नईं ता एई भरोटू शेटीए नचिंत होंदी। मूंबै ता ऐबड़ी फाही रौही होंइआ। बेटेआ। की केरना ऐ बेटी ज़ात सा, सौबी बगानी माणत, फिरी बाम्हणै री, कोई अंढी-तंढी गल होई जाऐ ता दलामी (बदनामी) बी पाप बी। थोड़ी देरी पीछ़ै बूऐ गल लाई।

तौबै पता नी पता होला की नईं। ऐ रामी म्हारै ग्रांएं रै गिरिधर प्रोहते री शोहरी सा। अंढा नी होंदा ता मूं तूसा दूही रा पूळटू बौन्हिए सीभी फिकरा न छ़ुटणा थी। मूंबै केबड़ी खुशी होणी थी। पर हांऊ तौबै एसा औगी न किहां झ़ोकनू, पर होरी धीरै एसा शोहरी बै है अंढी गलै रा थोग राग नी आथी, औज़ा तेइएं एक बी गल नी भाळी ज़ै एसै ज़ुआनी आळी कोई हरगत केरी होए…..। आच्छ़ा बेटेआ कमकै तूहै कोई झ़ूरी प्यारै री गल छ़ेड़ीए प्रेउगणी ज़ेहीं ता केर भला। अंढै ता लींढ-ठुंढ कई होआ सी, एसरी ज़ुआनी ता म्हारी लटी-फटी रै लोभै फेरे मारदै, पर ऐ बड़ी छिझिया सा। तबै हांऊ तौबै बोला सा…..। अबै तैयें ता हांऊ टूंबळी मूंडी केरीए सारी गला शुणदा रौहू। मेरे अंढा बी नी बोलुआ ज़ै, “बुआ हांऊ ता अंढी गला केरनी ज़ाणदा है नीं।”

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पर तदीहै बौगत लाइऐ मैं रामी पूछ़ीहै लेई, मैं बोलू―“भळीऐ रामीए ज़बै तौबै आपणै आगले ज़ीणे री एबड़ी है झ़ौंख सा ता एक ध्याड़ी बुआ बै बोलीऐ कीबै नी देंदी ज़ै कौसकी खरै ज़ैं: घौरा न मेरा ब्याह केरी दै। ज़ै तेरै नीं बोलीदा ता हांऊ बोली देनू”, “नई-नई ड़ै बाबू जी”―रामीऐ मूंबै टोकीए बोलू― “मैं हाज़ी अंढाहै निशचा नी केरू ज़ै ब्याह कौसकी लड़के सैंघै केरनू कीं लड़की सैंघै, सा अंढै ता हांऊ भाळा सा सीभी शोरी रै ब्याह लड़के ऐ सैंघै हौआ सी पर मूंबै इना छ़ौकरै री बड़ी झ़ीक हौआ, च़ीढ़ बी। लड़कै मूंबै बड़ै तंग केरा सी कोई टिचकरी केरा सी, कोई पाथर मारा सी कोई शिउळी, कोई सूनेरी मुरगी बोला सी। बाळ्हुऐदै साही। मैं औज़ा तैइंए नी फ्याड़ी ज़ै ए लोका केरा की ता कीबै सी। आमा पैहिलै-पैहिलै तां छ़ोकरै री इना शरेड़ा शरारता पीछ़ै तीना बै बड़ी लड़ा झ़ीकीआ मीशिया थी। तीनरै घौरा ज़ायै बोला थी तूसैरै कीड़ै मां बैहणी न्हूशा बेटी नी आथी, तीना बै छ़ेड़ा ना। होर बी बड़ी बका थी पर अबै-अबै एसै बी च़ुप लागी बेशिऐ तमासै भाळदी किच़की निहाळदी ज़ेहीं पर, ओरली-पोरली बेटड़ी एतरा ता बोलासी, “द्याउणी नमाड़ी शोहरी”, सैंघै छ़ोकरै बै मीशिया बी सी।

अंढै ता हांऊ बी हाज़ी काच़ा कुंआरा थी पर ज़ाणा फ्याड़ा सभ किछ़ थी। रामी री गला शूणीऐ मैं णदाज़ा लाऊ ज़ै पता नी ऐ मरध ना बेटड़ी, किछ़ बी नू होली। नईं ता 17-18 बौरशी शोहरी ता लड़के बै निहचै बैशणै नी देंदी, ऐ तज़रबा मूंबै कालजा न हुआदा थी, तबै मैं रामी तैयैं बी बूझ़ू थी ज़ै ए बी तंढीहै लियाड़दी लागी दी। हां नपौढ़ ता घौरू शोहरी होणे लायै कौलजै री शोहरी साही नझ़की नूं होली। पर एसरी गला शूणिऐ मेरा णदाज़ा गलत निकता। मूं ज़ै: नज़ाणा माण्हू बै ता ऐ भेद फ्याड़ना थी है करड़ा, पर बुआ साही च़तर च़लाक बेटड़ी बी रिहान थी।

अबै रामी मेरी तैयैं बी जंगलेट होई गई। बुआ च़ाहा थी कौसकी तबारी माण्हू सैंघै एई बारै न ढूणीऐ मन हौळका केरना। पता नी लालै सैंघै ता एई बारै न सौ शुड़क-शुड़क ढूणा बी होंदी। पर ज़ाहरा ढूणै री गल नंई थी आथी डाक्टरै बोलू सा ता बेटड़ीहै पर एसरै हार्मोन नी रामड़ै बौरझ़ै।

अबै-अबै किछ़ अंढा बी होंदा लागा थी ज़ै ज़बै हांऊ आपणै घौरा ग्रां ज़ाआ थी, ता सौ आपू बै केल्ही ज़ेहीं बुझ़दी लागी थी। हटीए आऊ ता बोहू ध्याड़ै लाणे बै रूशा थी। अबै ज़बै तेसा बै बोलदा लागा ज़ै थोड़ै ध्याड़ै पीछ़ै मूं दूर वलाइती बै ज़ाणा होर 4-5 बौरशा पीछ़ै हटणा ता ऐ गल रामी बै नी थी गौमदी। तबै बोला थी, “नेंई नई बाबू जी कीबै ज़ाणा औखै है रौहणा।”

तैबै एकी ध्याड़ै मूंबै बलाइती ज़ाणे रा आडर पूजू है। ज़िले दफ्तरा ज़ाइऐ सारी गल बात पक्की केरिऐ आऊ। ज़बै मैं बूआ बै दसू ता सौ जंडी ढौगै पौई। बुआ ता लालै मूंबै छ़ड़ा समझ़ाऊ। लालै बोलू मूं आगै शौठ झ़ार रपैया नगद, एक बड़ा बगीच़ा सेऊ रा, ता हाटी घौर सिभ किछ़ सा। सा तां मूं आगै एताना बध लखपति वणने री कुंज़ी बी, पर सौ खतरै री च़ीज़ तौबै नी देंदा। की केरना देश-परदेश भटकीया। होछ़ा नी केरना ता बड़ा कारोबार केर…..।

“दस झ़ार रुपया रामी रै नांए डाही बाकी सभ तौबै रौहू…..” पर मूं ज़ाणा थी, हांऊ नौठा। च़ार बौरशा अमरीका न रौहू कदी-कदी बुआबै राज़ी खुशी भेज़दा रौहू पर औरै न कोई ज़बाब नी धीना।

एंदे सार एकी सरकारी फार्मा ने निर्देशक लागा। थोड़ै ज़ेहै ध्याड़ै मेरे एकी ज़माती री बैहणी सैंघै मेरा ब्याह बी होई गैऊ, जम्मू रा एक फौज़ी अफसर मरीकै एज़ी ऐ गल केरी आंऊ थी। हांऊ सरकारी ता घौरू धांधै न अंढा लकोतुआ ज़ै च़ोढ़ा खुरकणै बै बारी नीछ़ी लागी। तबै बी ब्याह न पैहिलै घौरा जांदी घेरै एक बारी बसा न उतरू थी तौखै एतरा पता लागा ज़ै अबै बुआ रा कोई नी आथी, च़लदी ज़ैंही कथा शूणी थी। बाकी तबै घौरान एंदेआ आमै शणाई। खासा बुरा बूझ़ू।

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घौर न आमा सैंघै फार्मा न पूजू तां होरहै ताल थी, कल्याणी काला न औरै उभरदी लागी दी थी, ता सीभी संघी साथी व्याकल। आगला हाल मैं पीछ़ै दसू।

हांऊ देऊ पुरा रौहा थी ता लोकै बुझ़ु थी ज़ै दसोघे आपणा भाणज़ू (भतीजा) लालै री लटी-फटी मारने तैयें धर्म बेटी रामी आगै घौर ज़ुआईं डाहू होला। तैबै सब हरगता लोकै री बंद हुई थी। पर ज़बै मूं ज़ाइऐ भरम चूटा ता शरारती लोका बै खुल्ह होई गैई। कई लूचै पुंबै लालै री ज़ायदाती ता रामी री ज़ुआनी रै लोभै कौसीऐ बुआ रै उतरै ता कौसी ऐ सीधे ऐ रामी बै घेरने रै मंतर च़लाऐ। बुआ ता मसद्दी ता सोच़णे बच़ारने रै ऊंघै टाळी बी देआ थी। पर रामी की ज़बाब देणा, सौ ता फियाड़दी है नईं थी आथी। ज़बै कौस की बोला थी “एऊ रामीए मूंबै बौस ता” सौ किछ़ नोळा थी ढूणी। लोक बुझ़ा थी एसरा मर्ज़ा सा। एते लायै ज़िंऊ पै गल बिगड़ दी लागी, ज़िंऊ पैज़ोरा पाणा लाऊ। अंढी अति केरी ज़ै रामी ऐ बाहरै ज़ाणा है शटू, पर किछ़ बेउरी ज़ेही फीरी। किछ़ तेसै मूं ज़ाणे रा बुरा बूझ़ु, किछ़ लोकै झ़णाटणी लाई। तंढीहै पैहिलै थोड़ी, फीरी खासी बेउरी होंदैया बाळुही। अबै सौ हर कबै ता हर किखी ठूरदी लागी। बुआ बै बड़ी विथा होई रौही। तंडे है एक ध्याड़े तेसरी ल्हाशा वस्ती पीछ़ै रीढ़ी पांधै मीळी। लालै रांभड़ी तरह तेसरी गत सत केरी। पर गौळ्ही बज़ारा न तबै बी तेसरी कच़ींच़ा गला हल्ला शूणीदा रौहू। लोका डौरदै लागै। तबै तीनै रीढ़ी पांदै तेसरी डेहरी बणाइऐ पूज़ा करनी लाई। दसोघा न कभ कै तेसै शूणू होंदा ज़ै रामी भाटै (बाम्हणै) री कुंआरी शोहरी सा एसा छ़ेड़लै ता पाप लागला। ऐहैं गल तेसै बोलणी लाई “हांऊ भाट कुआरी सा”, पर लोकै जोगणी बोलीऐ मनणी लाई। साज़ै बेज़ै नौंवा परौणा होरा देऊ सैंघै तेसा बै बी देंदे लागै। ज़ुणा तेसा बै तंग केरने आळै थी ते ता डौरै बड़े है, भगत बणे। दूजा ऐ बी थी ज़ै रामीऐ कदी कौसी बै बुरा भला ना बोलू ना आपणी नीत बगाड़ी। सूनै साहीं च़ोखी रौही।थोड़े ध्याड़ै पीछ़े लाला होरै बी लाई। बुआ तेई बेठै है ज़ायदाती री बसीहत केरी बेठीदी थी। ज़ंडाहै लाला मूंआं सौ हरिद्वारा बै भगी। औज़ा तैयैं नी हटी। कल्याणीऐ उभरदी घेरै ज़ै दूई त्राई गला जोगणी री मनणै बै बोली थी ते बड़ी करड़ी ता आथी नई थी। पर कल्याणी बै तीनारा पता नई थी आथी, कीबै ज़ै तेसै ते बेहोशी न शणाहै थी। ज़ंढी सौ रांबड़ी हुई, आसै देऊ पुर नौठै। तिन्हां ध्याड़ै न तेसरा च़बर्खा बी नीकता सौ बी केरू। च़ाकरी भी धीनी। पर कल्याणीए ज़बै रामी री मूरत मेरै गौळा न भौरने री गल शूणी ता सौ नी तेसरै बेठी। मैं सूने रै होछ़णू ज़ैहैं जंतरा न मौढ़ीऐ जोगणी औधै ज़ाही ता कल्याणीऐ सौ बी मूं गौळै नी भौरने धीनी, छ़ुड़ाही सैंघै तौखै उभरी पौई भी। सैंघै बोलू “देआ डीगणे मूंबै ज़ै बुरी लागी तां, पर भाउआ (बहणीऐ) मेरी एतरी गल मनदी तां हांऊ तूसा बै…..।। दूई कच़ींच़ा मारी कल्याणी उसरी। मेरी शौशूए समझाई ता तेसै आपणै गौळा न जोगणी रा जंतर भौरू। त्राई बौरशा हुई म्हारै कोई बाल बच्चा नी ज़ौमू। अबै कल्याणी बै आपणी गलती ता च़ुभदी लागी। अबै आगली च़ाकरी बै देखया ज़ाली।

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1 Response

  1. Abhinandan Thakur says:

    Amazing story!
    Totally worth the time i spent on reading the article!

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