Category: Pahari Language

कुल्लू के घटना और श्रम प्रधान गीत

जेठ-आषाढ़ में जब खेतों में धान रोपे जाते हैं तो घुटनों तक खेतों में पानी होता है। धान की पौध एक छोटी क्यारी से उखाड़ कर बड़े-बड़े खेतों में पुन: रोपी जाती है। रोपने के श्रम-प्रधान काम की थकावट को गीत गा-गा कर दूर किया जाता है। ओबू और ओबी किसी पुराने जमाने में प्रेमी-प्रेमिका हुए हैं, जिनका प्यार इसी परिवेश में पनपा था और अब उनके प्यार की याद लोकगीत में ताज़ा है। धान रोपने के कार्य को ‛रूहणी’ कहते हैं।

पहाड़ी भाषा और साहित्य का इतिहास तथा उपलब्धियां | सोमसी आलेख (1990)

पहाड़ी भाषा का अर्थ है―पहाड़ों में बोली जाने वाली भाषा। हिमाचल प्रदेश तथा उसके समीपस्थ क्षेत्रों में बोली जाने वाली समान भाषा के आधार पर इस भाषा को पहाड़ी (हिमाचली) भाषा कहा जाता है। हिमाचल प्रदेश के मुख्य क्षेत्र कुल्लू, मण्डी, बिलासपुर, हमीरपुर, शिमला, सोलन, सिरमौर, चम्बा, कांगड़ा, ऊना, लाहुल-स्पिति और किन्नौर हैं। इन क्षेत्रों में लाहुल-स्पिति और किन्नौर में तिब्बती-वर्मी भाषा की हिमालयी बोलियों का प्रचलन है तथा अन्य क्षेत्रों में आर्य भाषा परिवार की पहाड़ी उपभाषाएं बोली जाती हैं।

जोगणी

जोगणी

पुरोहित चंद्रशेखर ‛बेबस’ की कुळूई-पहाड़ी में लिखी एक लघु कथा ज़ेबै मेरी लाड़ी कल्याणी बै उभरदै दूई राती...

कुलुई प्रकाशित साहित्य | सोमसी आलेख (1979)

कुलुई से अभिप्राय पहाड़ी भाषा की उस बोली से है जिस का सामान्य क्षेत्र कुलू जिला है। कुलुई विशेष, भीतरी सिराजी और बाह्य सिराजी इस के तीन रूप हैं, या इन्हें कुलुई के अंतर्गत तीन उपबोलियाँ कहा जा सकता है। लोक साहित्य की दृष्टी से जहाँ तीनों उप-बोलियाँ बड़ी समृद्ध हैं, वहाँ लिखित साहित्य की दिशा में कुलुई विशेष में अधिक रचनाएं मिलती हैं, जब कि अन्य दो उप-बोलियों में लिखित रूप कम ही देखने को मिलता है।

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