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कुल्लू का मोहक लोक-नृत्य: नाटी

नाटी का जो वर्तमान प्रचलित रूप है, इसे ‘सराजी नाटी’ कहते हैं। नाटी का सम्बन्ध भीतरी सराज से है। इस का उद्भव भले ही कहीं हुआ हो परन्तु यह पल्लवित, पुष्पित और विकसित भीतरी सराज में ही हुई है। नाटी को यदि गीत अर्थात् शब्द यदि कुल्लू ने दिया है तो स्वर, ताल और गति भीतरी सराज से मिली है। आज भी यह क्षेत्र नाटी पर अपना प्रभाव और अधिकार बनाये हुए है। नाटी की मौलिकता और कला का उत्कर्ष यहीं सुरक्षित है।

कुल्लू के घटना और श्रम प्रधान गीत

जेठ-आषाढ़ में जब खेतों में धान रोपे जाते हैं तो घुटनों तक खेतों में पानी होता है। धान की पौध एक छोटी क्यारी से उखाड़ कर बड़े-बड़े खेतों में पुन: रोपी जाती है। रोपने के श्रम-प्रधान काम की थकावट को गीत गा-गा कर दूर किया जाता है। ओबू और ओबी किसी पुराने जमाने में प्रेमी-प्रेमिका हुए हैं, जिनका प्यार इसी परिवेश में पनपा था और अब उनके प्यार की याद लोकगीत में ताज़ा है। धान रोपने के कार्य को ‛रूहणी’ कहते हैं।

Raksasa Lore in the Kulu Valley

In this text the author lists a number of encounters between Raksasas, gods, and men, as well as documents some ancient and contemporary incidents in the upper Beas valley in Kulu.

Journey to Kulu in the Himalayas (1893)

From Bajaura a pretty path planted with apricot trees leads along the right bank of the Bias via Shamsi to Sultanpur. At Shamsi there are several stones on the left side of the road and in front of the door of a hut there is a Buddhist wheel carved on one of them. The stones are similar to those found in Nagar, but no one can say anything about them.

पहाड़ी भाषा और साहित्य का इतिहास तथा उपलब्धियां | सोमसी आलेख (1990)

पहाड़ी भाषा का अर्थ है―पहाड़ों में बोली जाने वाली भाषा। हिमाचल प्रदेश तथा उसके समीपस्थ क्षेत्रों में बोली जाने वाली समान भाषा के आधार पर इस भाषा को पहाड़ी (हिमाचली) भाषा कहा जाता है। हिमाचल प्रदेश के मुख्य क्षेत्र कुल्लू, मण्डी, बिलासपुर, हमीरपुर, शिमला, सोलन, सिरमौर, चम्बा, कांगड़ा, ऊना, लाहुल-स्पिति और किन्नौर हैं। इन क्षेत्रों में लाहुल-स्पिति और किन्नौर में तिब्बती-वर्मी भाषा की हिमालयी बोलियों का प्रचलन है तथा अन्य क्षेत्रों में आर्य भाषा परिवार की पहाड़ी उपभाषाएं बोली जाती हैं।

Historical Documents of Kulu

The inscriptions, hitherto discovered, which throw considerable light on the history of the valley, may now be briefly noticed. The foremost of these is the legend on the coin of a Kuluta king Virayaśa, which reads rajna Kolutasya Viryaśasya.[22] As has been pointed out by Professor Rapson, it can be ascribed on palaeographical grounds to the first or second century A.D.

Trilokinath Temple of Lahul

The temple features both Hindu and Buddhist elements, and its origins have long been a source of discussion among scholars. Some suggest that the temple was once a Hindu temple, while others affirm its Buddhist roots, based on art historical and architectural studies.

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